नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान गिरफ़्तार राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, छात्रों-कलाकारों का दमन व ‘विच हण्ट’ जारी!
योगी राज में मज़दूरों के हक़ में आवाज़ उठाना क़रार दिया गया जुर्म!

उदय

जैसा कि आप सभी जानते हैं अप्रैल माह में नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस ने सैंकड़ों मज़दूरों के साथ-साथ 7 मज़दूर कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया था। मज़दूरों का “गुनाह” यह था कि वे अपने जायज़ व संवैधानिक हकों के लिए एकजुट हुए थे और न्यूनतम वेतन, डबल रेट से ओवरटाइम का भुगतान, आठ घण्टे के कार्यदिवस जैसे बेहद बुनियादी अधिकारों की माँग कर रहे थे और इन मज़दूर कार्यकर्ताओं का “अपराध” यह था कि वे इनके समर्थन में आवाज़ उठा रहे थे। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 मई, 2026 को जनबुद्धिजीवी, लेखक, वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता सत्यम वर्मा तथा छात्र कार्यकर्ता व दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कलाकार आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) भी लगा दिया था। ये दो सामाजिक कार्यकर्ता उन सात एक्टिविस्टों में से हैं, जिन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस ने नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान हुई हिंसा को भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार किया था। बाक़ी पाँच एक्टिविस्ट आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि गुप्ता और मनीषा चौहान भी दो महीने से अधिक वक़्त बीत जाने के बाद भी अभी न्यायिक हिरासत में हैं। इसके बाद 30 मई को एक अन्य छात्र कार्यकर्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई कर रहे योगेश मीणा को भी यूपी पुलिस ने गिरफ़्तारी से जुड़े सभी संवैधानिक व न्यायिक मानदण्डों को ताक पर रखकर दिनदहाड़े दिल्ली विश्वविद्यालय से अगवा कर ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार कर लिया। योगेश का “जुर्म” भी यही था कि वह छात्र अधिकारों की वकालत के साथ मज़दूर हक़ों की भी बात करता था। योगेश भी अभी न्यायिक हिरासत में है। यानी अब कुल आठ राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिना किसी क़सूर के क़ैद में रखा गया गया है। इनमें से अभी तक किसी को भी ज़मानत नहीं मिली है। ज़मानत की प्रक्रिया को व्यावहारिक तौर पर नामुमकिन बनाने के मक़सद से गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं पर एक के बाद एक 10 से 11 एफ़आईआर दर्ज की गयी हैं। इनमें से कुछ एफ़आईआर में कार्यकर्ताओं को नामजद गिरफ़्तारी के दो माह बाद किया गया है।

गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं के वक़ीलों के अनुसार, अबतक उत्तर प्रदेश पुलिस उनके विरुद्ध कोई भी ठोस प्रमाण ज़िला, सेशन कोर्ट, इलाहाबाद उच्च न्यायालय या फिर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाइयों में नहीं पेश कर पायी है। हर बीतते दिन के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस की नोएडा “साज़िश” मामले में लिखी जा रहीं मनोहर कहानियाँ और भी मनोहर और दिलचस्प होती जा रही हैं! “साक्ष्यों” और “गवाहों” के नाम पर झूठ के पुलिन्दे जो काफ़ी दिमाग़ी कसरत के बाद पुलिस ने तैयार किये हैं वह किसी सड़कछाप बॉलीवुड फ़िल्म की पटकथा को भी मात दे सकते हैं! वहीं दूसरी ओर, “पाकिस्तानी-नेपाली कनेक्शन” से लेकर “अर्बन नक्सल लिंक” ढूंढ निकालने वाली गोदी मीडिया को भी अचानक साँप सूंघ गया है! मज़दूर कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ मनगढ़ंत झूठी ख़बरें चलाकर पब्लिक ओपिनियन बनाने में एकदम फिसड्डी साबित हुई यह पत्तलकारों की फ़ौज खुद एक आतंकी गिरोह है जिसकी जगह दरअसल सलाखों के पीछे है! लेकिन फिलहाल देश में उल्टी गंगा बह रही है: सामाजिक कार्यकर्ताओं व न्याय के लिए आवाज़ उठाने वालों को जेल और रेपिस्टों-दंगाइयों को बेल! वह भी तब अगर इन अपराधियों में से कोई ग़लती से गिरफ़्तार हो जायेे तो, वरना तो इनकी खुलेआम मौज चालू है। ख़ैर, अब तो देश की जनता समझ चुकी है कि जो गोदी मीडिया बोले, सच उसके उलट है।

जहाँ तक उत्तर प्रदेश पुलिस व प्रशासन का प्रश्न है तो उसने इस पूरे मामले के दौरान जिस प्रकार के ग़ैर-क़ानूनी हथकण्डे अपनाये हैं, उनकी मिसालें कम हैं। मज़दूर आन्दोलन को ही साज़िश क़रार देना, प्रतिरोध को ही अपराध में बदल देना, मज़दूर कार्यकर्ताओं को आतंकवादी घोषित करना, ये इन्हीं हथकण्डों का हिस्सा है। चाहे सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगाये जाने का सवाल हो या एक के बाद एक फ़र्ज़ी एफ़आईआर का जाल बिछाकर निर्दोष कार्यकर्ताओं को हिरासत में रखने का सवाल हो: इन सबका एकमात्र लक्ष्य है उनकी रिहाई को अधिकतम सम्भव समय के लिए टालना और मज़दूरों को यह सन्देश देना कि हक़ के लिए संघर्ष करोगे तो हश्र यही होगा!

रासुका क़ानून के विषय में तो उच्च न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा बार-बार टिप्पणी की गयी है कि सरकारें व पुलिस इसका इस्तेमाल लोगों को ग़ैर-वाजिब तरीक़े से जेल में रखने के लिए करती हैं और साथ ही इसका प्रयोग राजनीतिक विरोध और असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए किया जाता है। लगभग 79 प्रतिशत मामलों में एनएसए को न्यायालय ख़ारिज कर देते हैं, जो स्वयं इस क़ानून के दमनकारी चरित्र को दिखलाता है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहलाने वाला भारत उन चन्देक देशों में से है जहाँ का संविधान ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ के क़ानून की इजाज़त देता है, जिसके तहत केवल सरकार या पुलिस प्रशासन के अधिकारियों को ‘मनोगत तौर पर सन्तुष्ट’ होने के आधार पर किसी को भी बिना किसी सबूत या ट्रायल के अधिकतम 12 माह तक जेल में रखा जा सकता है। 1980 में इस क़ानून के बनने के पहले 1977 तक ऐसा ही एक दूसरा क़ानून ‘मीसा’ 1971 से प्रभाव में था। उसके पहले 1950 में एक प्रिवेण्टिव डिटेंशन क़ानून आया था। 1977 से 1980 तक के तीन वर्ष ही आज़ाद भारतीय गणराज्य में ऐसा दौर हैं, जबकि ऐसा ‘प्रिवेण्टिव डिटेंशन’ का कोई क़ानून मौजूद नहीं था। इसके अलावा, आज़ाद भारत के पूरे इतिहास में आम इंसान की आज़ादी का मख़ौल बनाने वाला कोई न कोई ऐसा क़ानून मौजूद रहा है। इन क़ानूनों के लिए जो औपनिवेशिक क़ानून मॉडल का काम करता रहा है, वह है अंग्रेज़ों का कुख्यात रोलैट एक्ट। यही वह दमनकारी क़ानून था जिसके विरोध में जलियाँवाला बाग़ का जुटान हुआ था, जिस पर गोली चला कर अंग्रे़ज़ों ने हज़ारों भारतीय लोगों का क़त्ले-आम किया था। आज का राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून भी रोलैट एक्ट के दमनकारी प्रावधानों के सिद्धान्तों पर ही चलता है। इसके अनुसार, अगर किसी पुलिस अधिकारी, डीएम या सरकार को व्यक्तिगत तौर पर यह “आत्मगत सन्तोष” है कि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक क़ानून-व्यवस्था के लिए ख़तरा हो सकता है, तो उसे बिना किसी सबूत या मुक़दमे के जेल में रखा जा सकता है। यह ऐसा क़ानून नहीं है जिसके तहत आपको किसी किये गये अपराध के आधार पर हिरासत में रखा जायेे, बल्कि एक ऐसा क़ानून है जो बिना कोई अपराध किये भी आपको जेल पहुँचा सकता है क्योंकि पुलिस या सरकार को यह “लगता है” कि आप अपराध कर सकते हैं!

हालिया दिनों में सोनम वांगचुक, डा. कफ़ील ख़ान जैसे लोगों पर यह दमनकारी क़ानून लगाया गया था। इसके पहले इसे ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट ए. के. रॉय व अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध भी इस्तेमाल किया जा चुका है। ज़ाहिर है, जैसा कि कई बार विभिन्न न्यायालयों ने भी इंगित किया है कि सरकारें इस दमनकारी काले क़ानून का इस्तेमाल राजनीतिक विरोध व आम लोगों के जनवादी व नागरिक अधिकारों को दबाने के लिए करती रही हैं। जनवादी उसूलों से देखा जाये तो ऐसे क़ानून का अपने आपको लोकतान्त्रिक देश कहने वाले किसी देश में कोई स्थान नहीं हो सकता है। लेकिन चूँकि हमारे देश के संविधान के आर्टिकल 22 के एक आपवादिक क्लॉज़ में ऐसे क़ानून की इजाज़त है, इसलिए इस देश का शासक वर्ग और उसकी सरकारें (चाहें वे किसी भी पूँजीवादी चुनावी पार्टी की हों) ऐसे दमनकारी क़ानून का इस्तेमाल करती रही हैं। कई क़ानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह क़ानून प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धान्तों के ख़िलाफ़ जाता है।

मौजूदा मामले में सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी के विरुद्ध इसी क़ानून का इस्तेमाल किया गया है। अब आते हैं योगेश मीणा की गिरफ़्तारी के सवाल पर। यूपी पुलिस द्वारा अवैध अपरहरणों और ग़ैर-क़ानूनी गिरफ़्तारियों की कड़ी में योगेश मीणा का मामला सबसे ताज़ा है। 30 मई 2026 को यूपी एसटीएफ़ (उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स) के कई लोगों ने सादी वर्दी में बिना अपनी पहचान बताये लगभग 1 बजे दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज परिसर के बाहर से योगेश मीणा (विधि संकाय में एलएलबी के छात्र और एसआरसीसी के पूर्व छात्र) तथा समीर कुमार (रामजस कॉलेज में बीए के छात्र) को अवैध रूप से उठा लिया। दोनों छात्रों को जबरन एक चारपहिया वाहन में बैठाया गया। उन्हें न तो कोई वारण्ट दिखाया गया, न गिरफ़्तारी के आधार बताये गये, न कोई सीज़र मेमो दिया गया और न ही उन्हें उनकी गिरफ़्तारी से सम्बन्धित कोई आधिकारिक दस्तावेज़ दिखाये गये। इसके बाद उन्हें कई घण्टों तक दिल्ली में इधर-उधर घुमाया गया। यही नहीं, जब पुलिसकर्मियों को पता चला कि योगेश अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय से हैं और समीर अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय से हैं, तब उन्हें घटिया जातिसूचक गालियों और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। कई अख़बारों और स्वतन्त्र पत्रकारों की रिपोर्टों के ज़रिये तथा योगेश और समीर के वकीलों द्वारा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, दिल्ली पुलिस आयुक्त, डीसीपी नॉर्थ, दिल्ली पुलिस तथा मॉरिस नगर पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी (एसएचओ) के समक्ष दर्ज की गयी शिकायतों में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा किये गये जातिगत गाली-गलौज, मौखिक तथा शारीरिक हमले के चौंकाने वाले आरोप सामने आये।

कई घण्टों तक चले इस गाली-गलौज और डराने-धमकाने के बाद समीर को रिहा कर दिया गया, जबकि योगेश को नोएडा मज़दूर आन्दोलन में हिंसा मामले से सम्बन्धित एफ़आईआर संख्या 169/26 के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया। बाद में उसे एफ़आईआर संख्या 163/26 और 164/26 में भी गिरफ्तार कर लिया गया। योगेश पर मज़दूरों को हिंसा के लिए उकसाने के झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाये गये हैं। योगेश का एकमात्र “अपराध” यह था कि उन्होंने नोएडा के मज़दूरों के साथ एकजुटता व्यक्त की। उन्हें शान्तिपूर्ण ढंग से विरोध-प्रदर्शन करने की अपील की, तथा यूपी पुलिस द्वारा क़ानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन और कार्यकर्ताओं एवं मज़दूरों के ख़िलाफ़ चलाये जा रहे सुनियोजित उत्पीड़न की खुलकर आलोचना की।

चूँकि उत्तर प्रदेश पुलिस के पास योगेश मीणा की गिरफ़्तारी की कोई वास्तविक वजह या आधार नहीं था, वैसे ही जैसे अन्य गिरफ़्तार मज़दूर कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी के सम्बन्ध में नहीं था, इसलिए उसका नाम ड्राइवर अनिल कुमार के साथ जोड़ा गया। ज्ञात हो कि अनिल कुमार वही ड्राइवर है जिसने नोएडा के मज़दूरों के व्हाट्सऐप ग्रुप में भड़काऊ मैसेज भेजे थे, जिसने स्वयं को उत्तर प्रदेश पुलिस के एक अधिकारी के लिए काम करने वाला बताया था, और जिसे बाद में यूपी पुलिस ने गिरफ़्तार किया था या फिर जिसे उत्तर प्रदेश पुलिस को मजबूरन गिरफ़्तार करना पड़ा था।

पाठकों को याद दिला दें कि ‘जनसत्ता’ व एक्सप्रेस ग्रुप और अन्य कई मीडिया समूहों की रपटों के अनुसार, कई कार्यकर्ताओं और स्वतन्त्र पत्रकारों ने इस बात के प्रमाण कई हफ़्ते पहले से ही (17 अप्रैल से ही) सार्वजनिक कर रखे थे कि मज़दूरों के व्हाट्सऐप ग्रुपों में उत्तर प्रदेश पुलिस के लोग, जैसे नोएडा पुलिस की एक सबइंस्पेक्टर बीना, जोकि नोएडा सैक्टर 142 में कार्यरत है और नोएडा पुलिस के एक अधिकारी का ड्राइवर अनिल कुमार (जैसा की उसने खुद दावा किया था) मौजूद थे, जो भड़काऊ ऑडियो सन्देश, स्क्रीनशॉट व्हाट्सऐप ग्रुप में शेयर कर रहे थे। यह जानकारी सार्वजनिक होने के बावजूद भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने इसपर कोई स्पष्टीकरण देना ज़रूरी नहीं समझा था और न ही इन दोनों पर कोई उचित कार्रवाई ही की गयी थी! उत्तर प्रदेश प्रशासन द्वारा बैठायी गयी मजिस्ट्रेट जाँच के सामने कुछ स्वतन्त्र पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुलिस के विरुद्ध मौजूद इन प्रमाणों को साझा करने का प्रयास और जाँच में सहयोग करने का प्रयास भी किया, लेकिन इस जाँच टीम के अधिकारियों ने ये प्रमाण लेने से इंकार कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका के माध्यम से उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में इस बात को गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं के अधिवक्ताओं द्वारा लाया गया जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस को जवाबतलब करते हुए नोटिस प्रेषित किया। इसके बाद आनन-फानन में उत्तर प्रदेश पुलिस ने ड्राइवर अनिल कुमार को गिरफ़्तार कर लिया था, वह भी नोएडा की मदरसन कंपनी के पीछे से!

लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा रचित मनोहर कहानियाँ अभी और दिलचस्प मोड़ लेने वाली थी! खुद पुलिस द्वारा घोषित “वांछित अभियुक्त नम्बर 1” यानी ड्राइवर अनिल कुमार हिंसा भड़काने के पक्के सबूतों के बावजूद दो हफ़्तों के भीतर ज़मानत पर रिहा हो गया लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ तमाम बेगुनाह मज़दूर व मज़दूर कार्यकर्ता बिना किसी ठोस प्रमाण की मौजूदगी के भी दो महीने से ज़्यादा समय से जेल में बन्द हैं। यूपी पुलिस की इस मनोहर दास्तान को जो तथ्य और भी मनोहर बनाता है वह यह है कि पुलिस ने कोर्ट में उसके भड़काऊ ऑडियो मैसेज को सबूत के तौर पर पेश ही नहीं किया, हालांकि पुलिस ने उसकी ज़मानत का “कड़ा” विरोध ज़रूर किया! बताते चलें कि अनिल कुमार के अधिवक्ता के तौर पर सूरजपुर कोर्ट बार असोसियेशन के प्रेसिडेण्ट मनोज भाटी पेश हुए थे।

अनिल कुमार की ज़मानत की सुनवाई के दौरान उसके वकील ने दलील दी कि एफ़आईआर संख्या 169 में उसका नाम नहीं था, एफ़आईआर ख़ुद ही काफी देरी से और बिना किसी वजह के दर्ज की गयी थी, अनिल के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने का कोई सबूत नहीं है, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। ये सभी बातें तो उन 8 कार्यकर्ताओं और कई मज़दूरों पर भी लागू होती हैं जो करीब दो महीने से जेल में बन्द हैं! यही बातें उन सभी आरोपियों के लिए क्यों सही नहीं थीं जिनकी ज़मानत ख़ारिज कर दी गयी? अनिल कुमार के वकील ने यह भी दलील दी कि अनिल कुमार 13 अप्रैल को दिल्ली में काम पर था, जिससे हिंसा में उसकी भूमिका की कोई भी गुंजाइश ख़त्म हो जाती है। तो फिर सत्यम वर्मा का क्या, जो लखनऊ में थे? यह तथ्य सत्यम वर्मा को ज़मानत देने की वजह क्यों नहीं बना? सत्यम वर्मा पर बिना किसी कारण के दमनकारी रासुका लगाया गया है, ताकि उनकी ज़मानत को ही फ़िलहाल मुश्किल बना दिया जायेे। सच तो यह है कि अनिल कुमार के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने को लेकर पक्के व सार्वजनिक सबूत मौजूद हैं लेकिन फिर भी उसे योगी राज में काफ़ी जल्दी “इंसाफ” मिल गया!

अनिल कुमार से जुड़ी उत्तर प्रदेश पुलिस की कहानी में और भी विरोधाभास सामने आये हैं। अनिल कुमार ने दावा किया था कि वह नोएडा पुलिस के किसी सीनियर अधिकारी के लिए काम करता था, उसने उसका नाम “विजय गुप्ता” बताया था। एक महीने से ज़्यादा समय तक चुप रहने के बाद, उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ़्तारी के बाद दावा किया कि वह दिल्ली में एक व्यक्ति का प्राइवेट ड्राइवर था। फिर, कुछ दिनों बाद, एसआईटी जाँच अध्यक्ष ADCP स्वतंत्र सिंह ने दावा किया कि वह एक सेंट्रल गवर्नमेंट एजेंसी में ड्राइवर था। अदालत में जमा किये गये अनिल कुमार के पहचान पत्र में मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफ़ेयर्स का पास दिखाया गया है, लेकिन यह नहीं बताया गया है कि वह किसके लिए काम करता है। इन अन्तरविरोधी दावों की असल वजह क्या है, यह उत्तर प्रदेश पुलिस ही बता सकती है। यही नहीं, अब तक उत्तर प्रदेश पुलिस ने अनिल कुमार के कॉल डिटेल रिकॉर्ड या बैंक सम्बन्धी लेनदेन के डिटेल्स का खुलासा नहीं किया है, जिससे यह साबित हो सके कि उसका उत्तर प्रदेश पुलिस से कोई सम्बन्ध है कि नहीं। ये सभी गड़बड़ियाँ उत्तर प्रदेश पुलिस के दावों, बयानों और कार्रवाई पर एक बार फिर गम्भीर सवाल खड़े करती हैं।

कई स्वतंत्र पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, वकीलों आदि ने इस पूरे घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश पुलिस की संदेहास्पद भूमिका को देखते हुए यह माँग की है कि अनिल कुमार के पिछले एक साल के कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन, बैंक ट्रांज़ैक्शन और उसकी दूसरी गाड़ियों का रिकॉर्ड, जिन्हें वह संविदा पर चलाता या चलवाता था, सार्वजनिक किया जायेे। इन जनपक्षधर नागरिकों का मानना है कि अगर ये रिकॉर्ड अविलम्ब सार्वजनिक किये जाते हैं, तो नोएडा मज़दूर आन्दोलन में हिंसा भड़काने में ‘एजेण्ट प्रोवोकेटर’ के तौर पर उत्तर प्रदेश पुलिस की मिलीभगत साफ़ तौर पर सामने आ सकती है। इसके अलावा इन प्रगतिशील नागरिकों व कार्यकर्ताओं ने एक बार फिर एसआई बीना की भूमिका पर उत्तर प्रदेश पुलिस की चुप्पी पर सवाल खड़े किये हैं। मज़दूरों के व्हाट्सऐप ग्रुप में “अंडरकवर इंटेलिजेंस ऑपरेटिव” के तौर पर काम कर रही एसआई बीना पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की है जो मज़दूरों ग्रुप में घुसकर आगजनी के भड़काऊ स्क्रीनशॉट भेज रही थी? उत्तर प्रदेश पुलिस की एसआई बीना के बारे में चुप्पी और अनिल कुमार से जुड़े सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में आनाकानी, दोनों ही सवाल खड़े करते हैं: उत्तर प्रदेश पुलिस क्या छिपाने की कोशिश कर रही है?

वहीं जेल में बन्द राजनीतिक कार्यकर्ताओं की रिहाई को टालने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस ने आपराधिक न्यायिक प्रक्रिया को हथियार बनाते हुए गिरफ्तार कार्यकर्ता आदित्य आनन्द, रूपेश रॉय, सत्यम वर्मा, आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता, मनीषा चौहान, हिमांशु ठाकुर और योगेश मीणा के नाम कई और एफ़आईआर में जोड़ दिये हैं, ताकि मज़दूरों के साथ खड़े होने के “जुर्म” में इन कार्यकर्ताओं, कलाकारों, छात्रों, पत्रकारों को लगातार जेल में रखा जा सके। नोएडा के फेज़ 2 पुलिस स्टेशन में पहले से दर्ज 4 एफ़आईआर (FIR 163, 164, 165, 169) के अलावा उनके नाम अलग-अलग पुलिस स्टेशनों (सेक्टर 58, फेज़ 3 और सेक्टर 63) में दर्ज 5-6 और एफ़आईआर (FIR 116, 117, 149, 151, 157, 158) में भी शामिल किये गये हैं। इन सभी एफ़आईआर में कहानी एक जैसी है, ये सभी एक ही ‘कॉज़ ऑफ एक्शन’ यानी एक ही घटना से निकली हैं, एक ही टाइमलाइन और भौगोलिक क्लस्टर से सम्बन्धित हैं, और एक ही “साज़िश” की थ्योरी से संचालित हैं। जब देश की आम जनता ने उत्तर प्रदेश पुलिस की अनगिनत बेतुकी साज़िशों को नकार दिया, तो पुलिस अब इन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को क़ानूनी और नौकरशाहाना प्रक्रिया के अनन्त सिलसिले में फँसाने और उनकी रिहाई को और मुश्किल बनाने के लिए इन फ़र्ज़ी एफ़आईआर का जाल बुन रही है।

उत्तर प्रदेश पुलिस उपरोक्त अवैध कारनामे गिरफ़्तारी के दो महीने बाद और पहले से गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं पर जनविरोधी रासुका लगाने के एक महीने बाद कर रही है। यह अपनेआप में सिद्ध करने के लिए काफ़ी है कि पुलिस के पास जेल में बन्द कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ एक भी ठोस सबूत नहीं है और वह यह सिर्फ़ क़ानूनी प्रक्रिया को सज़ा में बदलकर जेल की अवधि बढ़ाने के लिए कर रही है। दरअसल अपनी इन्हीं हरक़तों के ज़रिये उत्तर प्रदेश पुलिस ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों को सही साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस संविधान के प्रति वफ़ादारी के लिए नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक वरिष्ठों को खुश करने के लिए काम करती है, कि “गिरफ्तारियाँ बिना सही प्रक्रिया के की जाती हैं, कई बार ग़लत इरादों से एफ़आईआर दर्ज की जाती हैं या दबा दी जाती हैं, और अधिकारियों की मर्ज़ी से मनमाने ढंग से ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन’ के नियम लागू किए जाते हैं।”

नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान और उसके बाद का उत्तर प्रदेश पुलिस का समग्र आचरण इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उपरोक्त प्रेक्षणों को सत्यापित ही करता है। अवैध रूप से लोगों को उठाने, हिरासत में प्रताड़ना, अन्तरराज्यीय क़ानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन तथा अब खुले तौर पर किये गये शर्मनाक जातिसूचक दुर्व्यवहार जैसे मामलों ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या इस पूरे प्रकरण में जाँच निष्पक्ष और संवैधानिक ढंग से की जा रही है? ये सारे सवाल गहरे सन्देह पैदा करने वाले हैं और तमाम ऐक्टिविस्टों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों व वक़ीलों द्वारा बार-बार उठायी जा रही इस माँग को बल देते हैं कि नोएडा मज़दूर आन्दोलन के दौरान शुरू से अन्त तक हुई तमाम घटनाओं में उत्तर प्रदेश पुलिस व प्रशासन की भूमिका की उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच होनी चाहिए ताकि पूरे मसले की सच्चाई सामने आ सके।

साथ ही, सवाल तो यह भी उठता है कि अगर मज़दूरों के अधिकारों के पक्ष में किसी संघर्ष या आन्दोलन में जाकर समर्थन देना या उसका ऑनलाइन समर्थन करना “अपराध” और “राष्ट्र की सुरक्षा” के लिए ख़तरा है, तो इस “राष्ट्र” में कौन-कौन शामिल है और “राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सुरक्षा” किनके हितों और किनकी सुरक्षा की बात करते हैं? क्या इसमें देश के 60 करोड़ से ज़्यादा शहरी और ग्रामीण मज़दूर शामिल नहीं हैं जिनका क़रीब 90 प्रतिशत हिस्सा 10-12 हज़ार रुपये महीने की मामूली-सी मज़दूरी में 12-12 घण्टे काम करने के लिए मजबूर हैं, जिसे डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान, ईएसआई-पीएफ़ और सामाजिक सुरक्षा के अन्य अधिकार प्राप्त नहीं हैं? जो अपने बच्चों के लिए दो वक़्त की रोटी तक नहीं जुटा पा रहा है, दवा-इलाज और शिक्षा तो बहुत दूर की बात है? क्या उनके द्वारा अपने हक़ों की आवाज़ उठाने और सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, वक़ीलों, छात्रों-युवाओं द्वारा उनका समर्थन किये जाने से “राष्ट्र की सुरक्षा” और “सार्वजनिक क़ानून-व्यवस्था” के लिए ख़तरा पैदा हो जाता है?

फिर इस देश में 90 फ़ीसदी मज़दूरों के श्रम अधिकारों का ख़ुलेआम हनन करने वाले, उन्हें न्यूनतम मज़दूरी (जो पहले ही बहुत कम है) न देने वाले, डबल रेट से ओवरटाइम न देने वाले, उन्हें कार्यस्थल सुरक्षा प्रबन्ध न देने वाले, उन्हें सामाजिक सुरक्षा न देने वाले मालिकों, कम्पनियों और उनके प्रबन्धन की ऐसे ग़ैर-क़ानूनी कार्य करने से “राष्ट्र की सुरक्षा” और “सार्वजनिक क़ानून-व्यवस्था” को ख़तरा क्यों नहीं पैदा होता और वह “अपराध” की श्रेणी में क्यों नहीं आते? 13 अप्रैल के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत क़रीब 1200 मज़दूरों को बिना किसी देरी के हिरासत में ले लिया। लेकिन पिछले कई दशकों से श्रम क़ानूनों की ख़ुलेआम धज्जियाँ उड़ाने, सुरक्षा के इन्तज़ामात न करने, न्यूनतम मज़दूरी न देने, साप्ताहिक अवकाश न देने, डबल रेट से ओवरटाइम भुगतान न करने के लिए कितनी कम्पनियों के मालिकों, प्रबन्धकों व अधिकारियों को हिरासत में लिया गया, उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआई दर्ज हुई और उनपर रासुका लगाया गया?

तो आज मेहनतकशों और मज़दूरों का यह सवाल पूछना क्या जायज़ नहीं है कि ऐसा तो नहीं कि जिस “राष्ट्र”, उसके “हितों” और उसकी “सुरक्षा” की बातें बार-बार तमाम सरकारें, मालिकान व प्रबन्धन, तमाम कम्पनियाँ, पुलिस व प्रशासन और मुख्यधारा का मीडिया अनन्त रूप से करते रहते हैं, उस “राष्ट्र” में केवल इस देश के धनिक वर्ग, मालिक वर्ग, उनकी नुमाइन्दगी करने वाले नेता व मन्त्री, ऊँचे नौकरशाह व अधिकारी शामिल हैं?

ऐसा तो नहीं कि उस “राष्ट्र” में देश के ग़रीब, मज़दूर, छोटे किसान, मेहनतकश और निम्न-मध्यवर्ग के लोग और उनके हक़ों की हिमायत करने वाले सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल ही नहीं हैं? और क्या यह सवाल भी जायज़ नहीं है कि मज़दूर अधिकारों की बात करना ही क्यों जुर्म में तब्दील कर दिया गया है? क्यों हड़ताल, संघर्ष, प्रतिरोध और आन्दोलन करने को ही अपराध क़रार दे दिया गया है? ये सवाल हर इंसाफ़पसन्द नागरिक के सामने आज खड़े हैं।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2026