मज़दूर दिवस एवं 1857 के विद्रोह को याद करते हुए पटना में आयोजित किये गये कई कार्यक्रम
मई दिवस के अवसर पर पटना में भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (आरडब्ल्यूपीआई) द्वारा पटना के दो निम्न मध्यमवर्गीय व मेहनतकश रिहायशी इलाकों में कार्यक्रम आयोजित किये गये। 2 मई को पटना के कौशल नगर इलाके में सांस्कृतिक संध्या एवं जन सभा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में सांस्कृतिक टीम द्वारा ‘हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे’ एवं ‘इन हाथों को काम नहीं’ जैसे गीतों की प्रस्तुति की गयी।
आगे, जन सभा में बात रखते हुए आरडब्लूपीआई के साथी अजित ने लोगों को मई दिवस के इतिहास से परिचित कराया। उन्होंने आगे कहा कि आज देश के कई हिस्सों जैसे पानीपत, गुड़गाँव, फ़रीदाबाद, मानेसर, नोएडा और भटिण्डा आदि शहरों में मज़दूर अपनी जायज़ माँगों के लिए आन्दोलनरत है। लेकिन उनकी माँगों को सुनने के बजाय सरकार ने मालिकों की जमात का पक्ष लेते हुए मज़दूरों के आन्दोलन का दमन किया है। नोएडा और गुरुग्राम में सैकड़ों मज़दूरों के साथ आदित्य आनन्द, रूपेश राय व मनीषा जैसे कई मज़दूर कार्यकर्ताओं, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि व आकृति जैसे छात्रों व कलाकारों और यहाँ तक कि सत्यम वर्मा सरीखे वरिष्ठ पत्रकार और सुप्रसिद्ध जनबुद्धिजीवी तक को, अब तक सामने आये तथ्यों के अनुसार, गैर-क़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार कर लिया गया है। इसके बावजूद, शासक वर्ग मज़दूरों और उनके संघर्षों से बुरी तरह से भयाक्रान्त है और इस भय में अपने दमन के पाटे को और अधिक ज़ोर-शोर से चलाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन वह भूल गया है कि जहाँ दमन होता है, वहाँ प्रतिरोध भी होता है। अजित ने आगे कहा कि आज हमें एकजुट होकर फ़ासीवादी सत्ता द्वारा की जा रही दमनात्मक कार्रवाईयों का विरोध करना होगा और पुलिस द्वारा गैर-क़ानूनी तरीक़े से गिरफ़्तार किये गए मज़दूरों, मज़दूर कार्यकर्ताओं और सत्यम वर्मा की रिहाई की माँग करनी होगी। इस कार्यक्रम के दौरान इलाके में रहने वाले लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए तथा उनके बीच व्यापक पैमाने पर पर्चा वितरण किया गया। इसके साथ ही उनके सम्पर्क भी जुटाये गये।
इसके अगले दिन पटना के गोसाईं टोला इलाके में नुक्कड़ सभाएँ करते हुए व्यापक पैमाने पर पर्चें बाँटे गये। इन नुक्कड़ सभाओं के ज़रिये इलाके के लोगों को न केवल मई दिवस के इतिहास से परिचित कराया गया बल्कि आज के दौर में देश में सत्ता पर काबिज़ फ़ासीवादी हुकूमत द्वारा उठाये जा रहे मज़दूर-विरोधी कदमों पर भी बात की गयी। इलाके के लोगों को नोएडा एवं मानेसर में मज़दूर आन्दोलन पर सरकार के इशारे पर किए गए पुलिसिया दमन के बारे में बताया गया तथा ऐसी दमनात्मक कार्रवाइयों के खिलाफ़ एकजुट होकर इसका विरोध करने की अपील भी की गयी।
3 मई को पटना स्थित राहुल सांकृत्यायन पुस्तकालय में सईद अख़्तर मिर्ज़ा द्वारा निर्देशित ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?’ फ़िल्म की स्क्रीनिंग एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया। फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद फ़िल्म के कथानक (जो 1980 के दशक की शुरुआत में मुम्बई के टेक्सटाइल मिलों के मज़दूरों की हड़ताल के इर्द-गिर्द घूमता है) और आज के दौर में देश में मेहनतकशों के हालात पर बातचीत की गयी। इस फ़िल्म स्क्रीनिंग और परिचर्चा के दौरान पटना के विभिन्न कॉलेजों के छात्र-छात्राएँ एवं आम नागरिक भी शामिल रहे।
5 मई को हण्ड्रेड फ्लावर्स स्टडी ग्रुप द्वारा मई दिवस एवं मज़दूर अधिकार के लिए जारी संघर्ष विषय पर एक ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस परिचर्चा में मई दिवस की ऐतिहासिक विरासत पर बात की गयी तथा भारत में मज़दूर आन्दोलन के इतिहास पर भी चर्चा की गयी जिसमें स्वतंत्रता-प्राप्ति के पूर्व के दौर में हुए मज़दूर आन्दोलनों और हड़तालों का ज़िक्र किया गया। वक्ताओं द्वारा इसके बाद आज़ादी के बाद विभिन्न कालखण्डों में बदलते राजनीतिक परिदृश्य में देश में खड़े हो रहे मज़दूर आन्दोलन पर बात की गयी। यह वह समय था, जब मज़दूरों के संघर्षों ने तत्कालीन सरकारों को मेहनतकशों के अधिकारों को सीमित अर्थों में ही सही, पर मानने पर मजबूर किया था। हालाँकि 1990 के दशक में लागू हुए उदारीकरण और निजीकरण की नीतियाँ लागू होने के बाद ठेका प्रथा, दिहाड़ी व कैजुअल श्रम, हायर एण्ड फायर, यूनियन बनाने के कानूनों को निष्प्रभावी बनाने जैसे मज़दूर-विरोधी प्रावधानों को लागू करने में तेज़ी आयी लेकिन 2014 में फ़ासीवादी भाजपा के सत्ता में आने के बाद से मज़दूरों के अधिकारों पर हमले पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ हो गये हैं। यहाँ तक किदशकों के संघर्ष के बाद मज़दूरों ने जो श्रम अधिकार हासिल भी किये थे, 2026 में चार लेबर कोड लागू करके उन्हें भी प्रभावत: ख़त्म कर दिया गया है। आज जब महँगाई और सरकार द्वारा थोपी गयी दुर्व्यवस्था से तंग आकर मज़दूर बेहतर वेतन और अन्य जायज़ माँगों के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं, तो फ़ासीवादी सरकार के आदेश पर पुलिस द्वारा उनका दमन किया जा रहा है।
इस परिचर्चा के दौरान यह बात भी निकल कर आयी कि ऐसी दमनात्मक कार्रवाइयों को पुरज़ोर विरोध करना होगा और मज़दूरों द्वारा अपने जायज़ हक के लिए किये जा रहे आन्दोलनों के समर्थन में आगे आना होगा क्योंकि यह सिर्फ़ मज़दूर आन्दोलन के दमन तक सीमित मसला नहीं है बल्कि वास्तव में इस देश के नागरिकों के जनवादी अधिकारों पर हमला है।
8 मई को 1857 की विरासत को याद करते हुए पटना के कौशल नगर में नौजवान भारत सभा और दिशा छात्र संगठन की ओर से साम्प्रदायिकता-विरोधी अभियान चलाया गया। इस दौरान नुक्कड़ सभाएँ की गयी एवं व्यापक पैमाने पर पर्चा वितरण किया गया। इन नुक्कड़ सभाओं में नौजवान भारत सभा एवं दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा बात रखते हुए कहा गया कि आज देश में मौजूद फासीवादी हुकूमत द्वारा साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। ‘हिन्दुत्व’ के उन्मादी नारों के तले मेहनतकश जनता की बुनियादी माँगों के लिए उठने वाली आवाज़ को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। ‘हिन्दू राष्ट्र’ के निर्माण के उद्घोष के पीछे देश की प्राकृतिक संसाधनों एवं सम्पदा तथा मेहनतकशों के श्रम की लूट को बढ़ावा दिया जा रहा है। अँग्रेजी औपनिवेशिक शासन के दौरान शासकों ने सम्प्रदायिकता के बीज बोए थे और तमाम धार्मिक कट्टरपंथी और साम्प्रदायिक संगठनों को बढ़ावा दिया था ताकि राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में सक्रिय विभिन्न धाराओं को कमज़ोर किया जा सके। उस वक्त भी अलग-अलग कट्टरपंथी हिन्दू व मुस्लिम संगठनों की सहायता से लोगों को जाति-धर्म के झगड़े में उलझाकर ब्रिटिशों ने भारत में वर्षों तक देश की जनता की शक्ति को कमज़ोर करने का काम किया था। आम मेहनतकश जनता को धार्मिक भावनाओं में बहाकर रखना और दंगों में उनका इस्तेमाल करना ये हमेशा से शासक वर्गों की चाल रही है। आज की तारीख में भारत की जनता को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने का काम फ़ासीवादी मोदी सरकार बख़ूबी कर रही है।
1857 के विद्रोह के दौरान देश का व्यापक जनसमुदाय धर्म-सम्प्रदाय की पहचान से ऊपर उठकर अँग्रेजी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एकताबद्ध होकर लड़ा एवं उसके चूलें हिला दी। इस संघर्ष में हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों ने ही मिलकर लड़ाई लड़ी, एक-दूसरे के लिए कुर्बानियाँ दीं और अंग्रेज़ी औपनिवेशिक शासक के विरुद्ध एक जुझारू जनएकजुटता क़ायम की।
वर्तमान समय में हमें भी 1857 के विद्रोह की महान विरासत को याद रखते हुए साम्प्रदायिक फ़ासीवादी ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा। आज आम मेहनतकश लोगों को सरकार की ‘फूट डालो और शासन करो’ की इस मंशा को पहचान कर इसकी मुख़ालफत करते हुए आज के ज्वलन्त व वास्तविक मुद्दों जैसे सबके लिए समान शिक्षा व्यवस्था, रोज़गार गारण्टी, आदि माँगों पर वर्ग के आधार पर एकजुट होकर संघर्ष करने की ज़रूरत है।
10 मई को पटना में राहुल सांकृत्यायन पुस्तकालय में कार्यक्रमों की इसी श्रृंखला के तहत ‘परज़ानिया’ फ़िल्म की स्क्रीनिंग एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया। फ़िल्म स्क्रीनिंग के उपरान्त आयोजित परिचर्चा में देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता के ख़तरों पर चर्चा की गयी, जिसका ज़िक्र फ़िल्म में भी प्रमुखता से मौजूद था। साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा भड़काये जा रहे उन्माद से आम लोगों की ज़िन्दगी बर्बाद होती है, वहीं दूसरी तरफ उन्माद भड़काने वाले नेता सत्ता का सुख भोगते हैं तथा अपने असली मालिकों यानी पूँजीपतियों के लिए पूँजीपरस्त नीतियाँ बनाते हैं। इस परिचर्चा में यह बात भी की गयी कि देश में मौजूद साम्प्रदायिक फ़ासीवाद से लड़ने के लिए ‘सर्वधर्म समभाव’ के खोखले नारों के बजाय सच्चे सेक्युलरिज़्म के आधार पर एकताबद्ध होने की जरूरत हैं, जिसका अर्थ होता है धर्म को पूर्णत: निजी मसला बनाया जाना और उसे राजनीतिक व सामाजिक जीवन से पूर्णत: अलग कर दिया जाना। इस परिचर्चा में विभिन्न कॉलेजों के छात्र एवं आम नागरिक शामिल हुए।
इसके बाद, 11 मई को ‘1857 का विद्रोह और आज के दौर में इसकी प्रासंगकिता’ विषय पर ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस परिचर्चा में 1857 के विद्रोह के इतिहास पर बातचीत की गयी। वक्ताओं की ओर से कहा गया कि इस विद्रोह में व्यापक जनसमुदाय धार्मिक पहचान से इतर हटकर एकताबद्ध होकर औपनिवेशिक दासता के खिलाफ लड़ा था। वक्ताओं ने आगे चर्चा में कहा कि आज हमें इसी विरासत को याद करते हुए धर्म व जाति के आधार पर बँटने के बजाय अपने साझा दुश्मन को पहचानने की ज़रूरत है। देश में सत्तासीन साम्प्रदायिक फ़ासीवादी शक्तियाँ सोची-समझी साज़िश के तहत लोगों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर बाँटने की कोशिश कर रही है। इससे हमें सावधान रहने की जरूरत है। वर्तमान दौर में, फ़ासीवाद से मुक़ाबले के लिए व्यापक जन एकजुटता कायम करनी होगी तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार आदि के मसले पर जन आन्दोलन खड़े कर, इस सत्ता को कठघरे में खड़ा करना होगा। साथ ही, फ़ासीवादी राज्यसत्ता द्वारा आम मेहनतकश जनता पर की जा रही दमनात्मक कार्रवाइयों का क़दम-क़दम पर पुरज़ोर विरोध करना होगा।
मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026













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