प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की विरासत को याद करो!
हिन्दू-मुसलमान एकता को बुलन्द कर ‘नये कम्पनी राज’ के खि़लाफ़ आवाज़ उठाओ!!
सनी
10 मई 1857 के दिन मेरठ में अंग्रेज़ी सेना की बंगाल रेजिमेण्ट के भारतीय सैनिकों ने बग़ावत कर अंग्रेज़ी अफसरों और सैनिकों को मार डाला और बैरकों और अंग्रेज़ी हुकूमत के दफ़्तरों को आग के हवाले कर दिया। मेरठ में बग़ावत हो चुकी थी और इसमें सैनिकों का साथ आम किसानों से लेकर दस्तकारों ने दिया। यह देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत थी। विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच कर दिया। कश्मीरी गेट पर तैनात अंग्रेज़ी नाके को ध्वस्त कर दिया गया और लाल कि़ले को फ़तह कर लिया। दिल्ली पर विद्रोहियों ने कब्ज़ा कर लिया और मुगल वंशज बहादुर शाह ज़फ़र को हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया गया, जो तब तक हिन्दुस्तान में वास्तविक राजनीतिक सत्ता खो चुके थे और एक स्टैम्प मात्र बनकर रह गये थे। आम जनता ने विद्रोही सैनिकों का साथ दिया। अंग्रेज़ी हुकूमत के आगे सिर झुकाने की जगह लड़ने के लिये कुछ राजे-रजवाड़े भी तैयार हो गये और कइयों ने ग़द्दारी भी की। सैनिको, किसानों और दस्तकारों के विद्रोह की आग कानपुर, अवध, बिहार, बंगाल से लेकर झाँसी तक पहुँच गई। इस विद्रोह ने ग़रीब की झोपड़ी से लेकर राजे-रजवाड़ों के महलों को भी चपेट में ले लिया। इस स्वतंत्रता संग्राम ने अंग्रेज़ी शासन की चूलें हिला दी थी। भारत के बड़े भूभाग तक फैले उस संघर्ष को कुचलने में अंग्रेज़ों को 1 साल से अधिक समय लग गया। इस दौरान जनता ने ज़बरदस्त कुर्बानियाँ दीं। न सिर्फ़ आम जन बल्कि रानी लक्ष्मी बाई, बेगम हज़रत महल, नाना साहब, कुंवर सिंह जैसी छोटी रियासतों के राजे-रजवाड़े भी इस संघर्ष में जान की बाज़ी लगाकर कूद पड़े थे।
अंग्रेज़ भारत में व्यापारी बनकर आए थे लेकिन 18वीं शताब्दी तक पूरे भारत को गु़लाम बना लिया। 200 साल की गु़लामी ने भारतीय समाज की नैसर्गिक गति को कुचल दिया। दस्तकार बर्बाद हो गए, किसानों पर लगान व करों का बोझ डालकर उनकी कमर तोड़ कर रख दी गयी, भारतीय सैनिकों के साथ दोयम दर्जे़ का व्यवहार किया गया और नस्ल के आधार पर भारतीय जनता को क़दम-क़दम पर बेइज़्जत किया गया। 200 साल की गुलामी ने भारतीय जनता को उसके अतीत से काट दिया। अपनी ही ज़मीन पर विदेशी आक्रान्ताओं की गु़लामी का दंश झेलती जनता गुलामी के खि़लाफ़ बिना रुके लड़ती रही। 1857 इस संघर्ष-चक्र में वह मील का पत्थर है जब देश के एक बड़े हिस्से ने एक साथ मिलकर विद्रोह कर दिया। इस संग्राम में अंग्रेज़ी औपनिवेशिक हुकूमत के खि़लाफ़ लाखों सैनिकों और आम जनता ने भाग लिया था। पूरे ब्रिटिश भारत का एक चौथाई हिस्सा मुक्त कर लिया गया था। यह विद्रोह ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कम्पनी राज के खि़लाफ़ था।
इस संघर्ष में हिन्दू-मुसलमान सबने साथ मिलकर खून बहाया। सैनिकों, किसानों, दस्तकारों, साधुओं, फ़कीरों, नाविकों से लेकर कुछ राजे-रजवाड़ों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के खि़लाफ़ फ़ौलादी हिन्दू-मुसलमान एकता का परिचय दिया था। इतिहास के सबसे बहादुराना संघर्षों में से एक इस संग्राम को जीता न जा सका। लेकिन इतिहास हमें सिखाता है कि यह इसलिये ही हारा गया ताकि भविष्य की लड़ाइयाँ जीती जा सकें। अभी राष्ट्रीय मुक्ति की चेतना अपनी भ्रूणावस्था में थी और आरम्भिक देशभक्ति की चेतना के साथ जनसमुदायों ने इस लड़ाई में हिस्सा लिया था। साथ ही, अभी कोई राष्ट्रीय मुक्ति को नेतृत्व दे सकने वाला आधुनिक राष्ट्रीय नेतृत्व भी नहीं था। भारतीय उपमहाद्वीप एक संक्रमण से गुज़र रहा था और चीज़ें तरल अवस्था में थीं। इसलिए इस संघर्ष के हारे जाने में कोई ताज्जुब की बात नहीं थी। अपने अनगढ़पन और संघर्ष के बिखराव के बावजूद अंग्रेज़ों के कम्पनी राज की जड़ें इस संघर्ष ने हिलाकर रख दी थीं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हारा गया परन्तु इसने ही अगली सदी में स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी योद्धाओं को लड़ने का जज़्बा और लड़ने का हुनर दिया।
आज हम किसी विदेशी साम्राज्यवादी शक्ति के गुलाम नहीं हैं। भारत को राजनीतिक स्वतन्त्रता 1947 में हासिल हो गयी थी। लेकिन यह भी सच है कि यह वह भारत नहीं है जिसका सपना भगतसिंह ने फाँसी के तख़्ते पर जाने से पहले देखा था। 1947 में साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुक्मरान जनता के संघर्षों से डरकर सत्ता की बागडोर भारतीय पूँजीपति के हाथ में छोड़ गए। 1947 के बाद क्रमिक विकास–प्रक्रिया से भारतीय पूँजीपति वर्ग ने आधे-अधूरे ढंग से पूँजीवादी विकास के कार्यभारों को ग़ैर-क्रान्तिकारी रास्ते से पूरा किया। यानी, न तो क्रान्तिकारी भूमि सुधार देश में लागू किये गये, न ही जनता की अन्य जनवादी आकांक्षाओं को समुचित रूप में पूरा किया गया। अंग्रेज़ों के दमनकारी क़ानूनों को कुछ बदलावों के साथ अपना लिया गया और एक ऐसा संविधान बनाया गया जो देश की जनता को बेहद सीमित जनवादी अधिकार देता है।
1857 में अपना खून बहाने वाले किसानों, सैनिकों और आम जन के सपनों की डोर को भगतसिंह और उनके साथियों ने थामा और उसे मज़दूरों-मेहनतकश के राज के सपने के रूप में आगे बढ़ाया था। यह सपना आज भी अधूरा है और इसे हमें ही पूरा करना होगा। आज हमें एक बार फिर से अपने पुरखों की फ़ौलादी हिम्मत और शोषण के खिलाफ बग़ावती ख़यालों से सीखना होगा। आज महँगाई और बेरोज़गारी से पूरा देश त्रस्त है; शिक्षा, चिकित्सा, आवास, यातायात और अन्य जन सुविधाओं का निजीकरण हो चुका है और जनता की सम्पत्ति और उसकी आय को पूँजीपतियों के हवाले किया जा रहा है। भ्रष्टाचार को क़ानूनी जामा दे दिया गया है और नेता घोटालों और घपलों के रिकार्ड तोड़ने के बाद भाजपा की वॉशिंग मशीन में धुलकर “पावन-पवित्र” होकर मन्त्री और मुख्यमन्त्री बन रहे हैं। बुर्जुआ जनवादी संस्थाओं को अन्दर से खोखला बना दिया गया है। हम एक अघोषित आपातकाल में जी रहे हैं। हम असल में एक ‘नये कम्पनी राज’ में जी रहे हैं। हम अपने वास्तविक मुद्दों पर एकजुट होकर संघर्ष न कर सकें इसलिए ही भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अंग्रेज़ों की तरह ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत जनता को धर्म के नाम पर बाँट रहे हैं। संविधान में सेक्युलरिज़्म की बातें लिखे होने के बावजूद पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के बाद भाजपा के सुवेन्दु अधिकारी खुलेआम इसे हिन्दुओं की जीत बता रहे हैं और मुसलमानों को सबक सिखाने की बातें कर रहे हैं!
ऐसे में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की विरासत हमारे लिए बेहद ज़रूरी बन जाती है। हमें अपने और अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए अपने अतीत के संघर्षों और अपने पुरखों से सीखना होगा और उनकी स्मृति से शक्ति लेनी होगी। 1857 की विरासत इतिहास की किताबों में पड़ी मृत इबारत नहीं हैं बल्कि हमें रास्ता दिखाती है। 1857 की विरासत 1947 तक आकर नहीं खत्म हो जाती है और न ही केवल संग्राहलयों में समेटी जा सकती है बल्कि यह उसके वारिसों को शोषण और अत्याचार के खि़लाफ़ लड़ने का पैगाम देती है।
1857: जब गरीबों की झोपड़ी से लेकर राजा–रजवाड़ों के महलों तक पहुँची संग्राम की लपटें
1857 में ही अम्बाला छावनी से लेकर देश की तमाम छावनियों में रह-रहकर विद्रोह की चिंगारियाँ फूट रहीं थी। इस बग़ावत का तात्कालिक कारण अंग्रेज़ों द्वारा सैनिकों को दी जाने वाली एनफिल्ड राइफ़ल थी जिसमें डाले जाने वाले कारतूस को मुँह से फाड़ने की ज़रूरत पड़ती थी। इसमें सूअर और गाय की चर्बी का इस्तेमाल होता था। हिन्दू और मुसलमान सैनिकों ने अपने धार्मिक विश्वासों के चलते इसके खि़लाफ़ आवाज़ उठाई जिसे बेरहमी से कुचल दिया गया। अंग्रेज़ों ने तुरन्त ही समाहार करते हुए इस राइफ़ल को लोड करने के तरीके़ को बदल दिया। लेकिन सतह के नीचे धधक रहे लावे को फूट पड़ने से वे रोक न सके। सैनिकों में अंग्रेज़ी शासन के खि़लाफ़ लम्बे समय से इकट्ठा हो रहा असन्तोष का ताप आक्रोश की ज्वाला में तब्दील हो चुका था। भारतीय सैनिकों की आय में अंग्रेज़ सैनिकों से बड़ा अन्तर था और उनकी पदोन्नति हज़ारों तरीक़ों से रोकी जाती थी; बैरकों में रहने की जगह, खाना खाने के स्थान से लेकर हर जगह उन्हें नस्ली भेदभाव और ग़ुलाम कौम के अपमान का अहसास दिलाया जाता था। हिन्दुस्तानी सैनिकों को अनुशासनहीनता के लिए बेहद कठोर दण्ड दिया जाता था।
दूसरी बात यह है कि सैनिक दरअसल वर्दी में किसान ही थे। आम किसानों पर अंग्रेज़ों ने लगान वसूली को मुगलों, मराठों और सिख सामन्ती राज के मुकाबले कई गुना बढ़ा दिया था। स्थायी बन्दोबस्त, रैयतवारी और महालवारी प्रणाली के द्वारा भूमि-सम्बन्धों को बदलकर नयी सामन्ती व अर्द्धसामन्ती भूमि व्यवस्था क़ायम की गयी थी। लगान न देने पर खेत ज़ब्त कर लिया जाता था, विरोध करने वालों को मार दिया जाता था, जेल भेजा जाता था और कोड़े बरसाये जाते थे। सैनिकों में इसके खि़लाफ़ गुस्सा लम्बे समय से आकार ले रहा था जो उनके किसान चरित्र को दिखाता था। भारत के दस्तकारों से भी कम्पनी ने प्लासी के युद्ध के बाद से मनचाही कर-उगाही की शुरुआत कर दी। दस्तकारों से माल भी मनमानी क़ीमतों पर हड़पा जाने लगा। यही किसानों के साथ भी हुआ। किसानों-दस्तकारों की तबाही शुरू हो गई। यहाँ के दस्तकारी वर्कशाप के कारखाने व काम-धन्धे अंग्रेज़ों ने अपने औपनिवेशिक आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए बर्बाद कर दिये।
भारत की शस्य-श्यामला धरती के जंगलों, खेतों, खानों-खदानों के दोहन से प्राप्त कच्चा माल ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति का आधार बना। कच्चे माल के दोहन ने जहाँ देश की प्रकृति की लूट को अंजाम दिया तो दूसरी ओर अंग्रेज़ी उद्योग के सस्ते मालों से ‘मुक्त प्रतिस्पर्धा’ में दस्तकार पूरी तरह बर्बाद हो गये। दस्तकार गाँव की ओर लौटने लगे या शहरों में काम की तलाश करने लगे। छोटी रियासतों और छोटे सामन्ती राजे-रजवाड़ों को भी अंग्रेज़ों ने बेइज़्ज़त किया था। अंग्रेज़ों ने भारत पर एक ऐसे औपनिवेशिक तंत्र को थोप दिया जिसमें भारत की किसानी व्यवस्था, दस्तकारी और आम जीवन का पुराना सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना तहस-नहस हो रहा था।
हम आज भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को जब 169 साल बाद याद कर रहे हैं तो हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि यह भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था। इसमें नष्ट होते पुराने भारत के अतीत की शक्तियों ने भी भागीदारी की और औपनिवेशिक संरचना में उभरते भारत की उदीयमान शक्तियों ने भी भागीदारी की। साम्राज्यवादी टट्टू इसे केवल सैनिक विद्रोह या धार्मिक युद्ध बोलकर आम जनता की लड़ाई को भुलाने की कोशिश करते हैं लेकिन यह केवल तात्कालिक धार्मिक कारण से भड़क उठा सैन्य-विद्रोह नहीं बल्कि ऐसा संग्राम था जिसमें देश के बड़े हिस्से की जनता के विविध हिस्सों ने भाग लिया। यह एक जन-प्रतिरोध युद्ध था। कम्पनी राज की शुरुआत से ही देश के अलग-अलग इलाक़ों में किसानों और आदिवासियों ने लगातार विद्रोह किये थे। लेकिन उनकी तुलना में 1857 का जनसंघर्ष देश के कहीं ज्यादा बड़े हिस्से में फैला हुआ और ज़्यादा संगठित था।
यह सच है कि इस स्वतंत्रता संग्राम का कोई दूरदर्शी केन्द्रीय नेतृत्व नहीं था जिसके पास भविष्य की शासन-व्यवस्था एवं सामाजिक ढाँचे के बारे में कोई सुविचारित रूपरेखा हो। सामन्ती राजे-रजवाड़े अपने अतीत की ज़मीन से लड़ रहे थे। किसानों, दस्तकारों, शहरी ग़रीबों और आमतौर पर किसान परिवारों से भरती सैनिकों और उनके नेताओं के ज़ेहन में एक ओर अतीत की ही ज़मीन थी और दूसरी ओर सैनिकों, किसानों, दस्तकारों और शहरी गरीबों में भ्रूण रूप में राष्ट्रीय चेतना भी जन्म ले चुकी थी। उनकी दोहरी चेतना थी और इस मायने में यह ‘पुराने भारत का अन्तिम प्रतिरोध-युद्ध’ भी था और ‘नये भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम’ भी था। यही दोहरी चेतना रानी लक्ष्मी बाई, बेगम हज़रत महल, कुँवर सिंह और तात्या टोपे सरीखे सामन्तों और सैन्य कमिटियों के दोहरे नेतृत्व के रूप में भी झलकती है। दीपायन बोस ने इसपर ठीक ही कहा है कि “इतिहास के एक विशेष संक्रमण-बिन्दु में लड़े गये 1857 के महासंग्राम का दोहरा चरित्र था। यह पुराने भारत का अन्तिम प्रतिरोध-युद्ध था और नये भारत का पहला स्वाधीनता-संग्राम भी। लेकिन इसका मुख्य पहलू पुराने भारत के प्रतिरोध-संघर्ष का ही था।” (दीपायन बोस, 1857, आरम्भिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता) इस संग्राम ने ग़दर पार्टी, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, भगतसिंह और उनके साथियों से लेकर नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस को प्रेरणा दी थी।
इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ों ने 1858 को भारत को रानी के ताज के मातहत कर कम्पनी राज को अंग्रेज़ी राज्यसत्ता की हुकूमत में तब्दील कर दिया। भारतीय जन के विद्रोह से डरकर अंग्रेज़ों ने सैन्य दमन के ताने-बाने को और भी मज़बूत कर दिया और दूसरी ओर औपनिवेशिक सत्ता की नौकरशाही व सिविल सेवाओं को भरने के लिए अंग्रेज़ी मानस वाले भारतीय क्लर्क तैयार करने हेतु नयी शिक्षा व्यवस्था भी आरोपित की। इस संघर्ष के बाद से ही अंग्रेज़ी हुक्मरानों ने भारतीय जनता की साझा लड़ाई को कमज़ोर करने के मक़सद से ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनायी और हिन्दू-मुसलमान का झगड़ा भड़काना शुरू किया और धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों को बढ़ावा देना शुरू किया। भारतीय समाज में अभी तक जनता के बीच कभी-कभार छोटे-मोटे स्थानीय स्तर के धार्मिक झगड़े हुआ करते थे। कई बादशाहों और राजाओं ने अपनी तात्कालिक राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कभी-कभार किसी एक धर्म का इस्तेमाल किया लेकिन वे साम्प्रदायिक नहीं थे।
आम जनता के स्तर पर व्यापक तौर पर लोगों के बीच साम्प्रदायिक नफ़रत के बीज बोने का काम सबसे पहले अंग्रेज़ों ने अपनी राजकीय मशीनरी के ज़रिये किया। यह आम धार्मिक झगड़े से इस रूप में अलग था कि पहली बार राज्य मशीनरी के व्यापक ढाँचे के ज़रिये साम्प्रदायिक आम सहमति का निर्माण किया गया। साम्प्रदायिकता के ज़हर ने 1857 में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाली हिन्दू-मुसलमान आबादी के बीच दरारें डाल दीं। उन्नीसवीं सदी के आख़िरी वर्षों और विशेष तौर पर बीसवीं सदी के शुरुआती दौर से हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे साम्प्रदायिक व साम्प्रदायिक फ़ासीवादी संगठनों ने इसमें अंग्रेज़ी सत्ता का पूरा साथ दिया। मुस्लिम लीग सरीखे संगठन भी इस साम्प्रदायिक आग में जनता को झोंकने में योगदान करते रहे। गणेश शंकर विद्यार्थी ने इसपर ही लिखा था कि “एक तरफ़ जहाँ जनआन्दोलन और राष्ट्रीय आन्दोलन हुए, वहीं, उनके साथ-साथ जातिगत और साम्प्रदायिक आन्दोलनों को भी जान-बूझकर शुरू किया गया क्योंकि ये आन्दोलन न तो अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ थे, न किसी वर्ग के, बल्कि ये दूसरी जातियों के खि़लाफ़ थे।” अंग्रेजों की इस ‘फूट डालो और राज करो’ यानी ‘डिवाइड ऐण्ड रूल’ की नीति से ही आज का भारतीय शासक वर्ग और उनके वर्तमान प्रमुख नुमाइन्दे यानी भाजपा-आरएसएस के लोग सीख रहे हैं और उसे अपनी फ़ासीवादी राजनीति का अंग बना रहे हैं। यही कारण है कि आर.एस.एस. ने देश की आज़ादी की लड़ाई में कभी कोई हिस्सा नहीं लिया।
अंग्रेज़ों की इस नीति को स्वतंत्रता आंदोलन से प्रतिरोध भी मिला। भगतसिंह और उनके साथियों व अन्य क्रान्तिकारियों और स्वतन्त्रता संग्रामियों ने साम्प्रदायिक शक्तियों के खि़लाफ़ मोर्चा खोल दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी हिन्दू-मुसलमान एकता का पैगाम देते एक साम्प्रदायिक दंगे को रोकने के प्रयास में शहीद हो गये। राहुल सांकृत्यायन, प्रेमचन्द, राधामोहन गोकुलजी से लेकर सैकड़ों स्वतंत्रता संग्रामियों व जनपक्षधर बुद्धिजीवियों व लेखकों ने हिन्दू-मुसलमान एकता का पैगा़म दिया। अंग्रेज़ों को भारतीय जनता के ज़बरदस्त आन्दोलन के आगे घुटने टेककर जब भागना पड़ा, तबतक उन्होंने भारत की धरती पर पली-बढ़ी साम्प्रदायिक शक्तियों को बढ़ाने में इतनी मदद कर दी थी कि हिन्दुस्तान को आज़ादी के वक्त की बँटवारे का दंश झेलना पड़ा और साम्प्रदायिकता की राजनीति और उसके झण्डाबरदार संगठन एक हद तक अपने को भारतीय समाज में हाशिये पर ही सही, पर स्थापित करने में सफल रहे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की हमारी जो सबसे बड़ी ताक़त थी हिन्दू-मुसलमान एकता उसे एक हद तक अंग्रेज़ कमज़ोर करने में कामयाब रहे थे। 1857 की विरासत का एक सबसे अहम सबक़ वह हिन्दू-मुसलमान एकता है जिसे भूलना हमारे लिए प्राणान्तक सिद्ध होगा।
नया कम्पनी राज और काले अंग्रेज़ों का शासन
आज हमारा देश गुलाम नहीं है। 1947 हमें राजनीतिक आज़ादी मिल गई। लेकिन इस आज़ादी के बाद भी इस देश में अमीरी और ग़रीबी की भयंकर खाई मौजूद है। महँगाई, बेरोज़गारी, भूख, कुपोषण, अशिक्षा ने देश की बहुसंख्यक जनता का जीवन मुहाल कर दिया है। भगतसिंह ने पहले ही कहा था कि अगर आज़ादी पूँजीपति वर्ग की पार्टी कांग्रेस के ज़रिये मिलेगी तो यही होगा कि गोरे अंग्रेज़ चले जाएँगे और उनकी जगह काले अंग्रेज़ काबिज़ हो जाएँगे। 169 साल बाद जब हम 1857 को याद कर रहे हैं तो अपने जीवन पर निगाह डालने से साफ़ हो जाता है कि हम एक ‘नये कम्पनी राज’ में जी रहे हैं। ‘नये कम्पनी राज’ में टाटा, बिड़ला, अम्बानी, अडानी, हिन्दुजा और गोयनका के वर्ग की चाँदी है और इस देश के आम मेहनतकशों के जीवन की बर्बादी है। पक्का रोज़गार नहीं है, कम्पनियों में ठेके पर दस-बारह हज़ार पर खटकर पेट नहीं भरता, जनता के पैसों पर खड़े किये गये सरकारी स्कूल से लेकर सरकारी अस्पताल तक औने-पौने दामों पर पूँजीपतियों को बेचे जा रहे हैं। पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें भारी सरकारी टैक्स के चलते आसमान छू रही है। वहीं गैस सिलेण्डर की क़ीमतों ने लोगों को बिलकुल बेबस कर दिया है। ऊपर से एक लम्बे समय से मज़दूरों को बेहद कम मज़दूरी पर खटा कर मालिक अपनी जेबें भर रहे हैं। इस कारण ही इस साल मज़दूरों का गुस्सा सड़कों पर बह निकला और हमारा देश एक हड़ताल-आन्दोलन की लहर से गुज़र रहा है। पानीपत, मानेसर, नोएडा, सूरत, भरूच, बरौनी से लेकर सालेम, फ़रीदाबाद, हरिद्वार, सिडकुल तक मज़दूर जीवनयापन योग्य मज़दूरी, डबल रेट से स्वैच्छिक ओवरटाइम, साप्ताहिक छुट्टी और बेहतर कार्यस्थितियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो कि उनकी निहायत वाजिब माँगें हैं।
हमेशा की तरह हड़तालों को कुचलकर सरकार इसका ठीकरा आन्दोलन के नेताओं पर डाल रही है और उन पर साज़िश, पाकिस्तानी लिंक, नक्सलवाद आदि के झूठे आरोप लगा रही है और उनके विरुद्ध षड्यन्त्र कर रही है। लेकिन फिर भी हड़ताल-आन्दोलन थम नहीं रहा है। ग़रीब किसान महँगे यूरिया, महँगे बीज व महँगे होते अन्य कृषि इनपुट उत्पादों तथा पानी और बिजली की सरकारी बदइन्तज़ामी के चलते बर्बाद हो रहे हैं जबकि सरकार धनी किसानों और कॉरपोरेट कम्पनियों के हित साध रही है। शहर से लेकर गाँव में ग़रीब मज़दूर-मेहनतकश आबादी तबाह-बर्बाद है। इसकी जि़म्मेदार भाजपा सरकार और समूची पूँजीवादी व्यवस्था है। अपने चुनावी फण्ड में बॉण्ड से लेकर चुनावी ट्रस्टों के ज़रिये पूँजीपति कॉरपोरेट कम्पनियों से चन्दा लेने वाली भाजपा ने लम्बे समय से आर्थिक संकट से कराह रही भारतीय अर्थव्यवस्था का सारा बोझ जनता पर डालकर पूँजीपतियों को सौगातें दी हैं।
इस ‘नये कम्पनी राज’ को बेरोक-टोक चलाने के लिए भाजपा-आरएसएस ने अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को नये स्तर पर लागू किया है। देश की जनता बेरोज़गारी, महँगाई, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल और आवास जैसे असल मुद्दों के लिए न संघर्ष कर पाये, इसलिए ही फ़ासीवादी हुक्मरानों ने लोगों के बीच ही साम्प्रदायिक नफ़रत के बीज बो दिये हैं। फ़ासीवादी प्रचार तंत्र के व्यापक ताने-बाने और अपने काडर-आधारित ढाँचे के दम पर और गोदी मीडिया का इस्तेमाल कर भाजपा और संघ ने देश की मुस्लिम आबादी को हिन्दू आबादी के काल्पनिक शत्रु के तौर पर खड़ा किया है। ‘लव जिहाद’, ‘लैण्ड जिहाद’, ‘थूक जिहाद’ से लेकर गोरक्षा के ढोंग और मस्जिदों के नीचे मन्दिरों के अवशेष ढूँढकर, घुसपैठियों का नक़ली भय दिखाकर फ़ासीवादी शक्तियों ने जनता की जुझारू एकजुटता को असल मुद्दों पर क़ायम होने से रोका है। जब इस एक ‘नये कम्पनी राज’ में इस मायने में अंग्रेज़ों के वारिस यानी भाजपा-आरएसएस के लोग ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को अपना रहे हैं तो हमें भी 1857 के अपने पुरखों से सीखना होगा। आज के नये ‘कम्पनी राज’ और ‘फूट डालो राज करो’ की नीति के नये पैरोकार यानी साम्प्रदायिक फ़ासीवादियों से संघर्ष करने के लिए हमें 1857 के शहीदों की स्मृति से संकल्प लेते हुए संघर्ष करना होगा।
इस सन्दर्भ में हमारे लिए सबसे अहम सबक़ यह है कि धर्म हर किसी का व्यक्तिगत मसला है। इसका राजनीति और सामाजिक जीवन से कोई भी रिश्ता नहीं होना चाहिए।
1857 के स्वतंत्रता संग्रामियों ने धर्म पर अलग होते हुए भी अपने साझा दुश्मन यानी अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ाई लड़ी थी। भगतसिंह ने इस बात को ही कहा था कि “यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग–अलग ही रहें।’’.. “हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर ज़रूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमे बचा लेंगे।”। (भगतसिंह, साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज, 1928) भगतसिह का यह पैगाम हमें घर-घर तक ले जाना होगा। 1857 में हम हारे थे लेकिन इस लड़ाई के सबक़ों को सीखकर ही हमने 1947 में अंग्रेज़ों को देश से भगाया था। लेकिन जब भी हम इस सबक़ को भूलते हैं तो अंग्रेज़ों द्वारा पैदा किये गये और संघ द्वारा पाल पोसकर बड़े किये साम्प्रदाकियता के दानव का शिकार होकर एक-दूसरे का ख़ून बहाते हैं और इसका फ़ायदा हमेशा सत्ताधारी शासक वर्गों को पहुँचता है। हमें अपने अधिकारों की लड़ाई जीतनी है तो धर्म को पूर्णत:
निजी मसला बनाकर हिन्दू-मुसलमान एकता क़ायम करनी ही होगी। भगतसिंह और उनके साथियों का यही सन्देश था और 1857 के संघर्ष की यही विरासत है।
मज़दूर बिगुल, अप्रैल-मई 2026













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