“आँकड़े छिपाओ, बेरोज़गारी भगाओ!”
बेरोज़गारी से लड़ने का मोदी सरकार का नायाब नुस्ख़ा

वारुणी पूर्वा

भारत में बेरोज़गारी नहीं है, लोगों को बस उसके होने का वहम है! क्योंकि सरकार के आधिकारिक आँकड़े यही बताते हैं कि 2017-18 से 2023-24 के वर्षों में बेरोज़गारी दर 6% से सीधे 3.2% तक कम हो चुकी है। रोज़गार देने में यह सरकार इतनी अव्वल हो गयी है कि इसने विश्व के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं! भारत में मोदी जी की कृपा से युवाओं के बीच की बेरोज़गारी दर 17.8% से गिरकर 10.2% हो गयी जोकि वैश्विक युवा बेरोज़गारी दर (13.3%) से कम है! यह भारत का विश्वगुरु बनने की ओर एक बड़ा क़दम है!

ज्ञात हो राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (जोकि स्टैटिस्टिक्स एण्ड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन मंत्रालय के तहत आता है) द्वारा 2017 में ही भारत में रोज़गार और बेरोज़गारी  संकेतकों का अनुमान लगाने के लिए पीएलएफ़एस (पीरियाडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे) की शुरुआत की गयी थी। पीएलएफ़एस हर साल अपनी रिपोर्ट पेश करता है और पीएलएफ़एस के आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार भारत में जून 2025 के दौरान बेरोज़गारी दर सिर्फ़ 5.6% थी. और 15 से 29 साल के नौजवानों के बीच यही बेरोज़गारी दर 15.3% पायी गयी। वार्षिक पी.एल.एफ़.एस.  रिपोर्ट के आधिकारिक आँकड़ों  से यह भी पता चलता है कि पिछले छह वर्षों में बेरोज़गारी दर घटकर लगभग आधी हो गयी है—2017-18 में 6 प्रतिशत से 2023-24 में 3.2 प्रतिशत तक।

चौंकिये मत! यही भारत देश के युवाओं की सच्चाई है! मोदी सरकार दिन-रात एक करके युवाओं के लिए काम करती चली जा रही है! उनके लिए स्किल इण्डिया, मेक इन इण्डिया, डिजिटल इण्डिया और ना जाने कितने सारे इण्डिया का निर्माण कर चुकी है! अब अगर इतने सारे अवसरों के बावजूद कोई छात्र बेरोज़गार घूम रहा है, तो ज़रूर उसी में कोई कमी होगी! इसमें सरकार का नहीं बल्कि युवाओं का दोष है कि आख़िर क्यों वे अपने आप को उस क़ाबिल नहीं बनाते, आख़िर क्यों वो कामचोरी करते हैं? यदि बिहार पुलिस कांस्टेबल की भर्ती के लिए 4200 पदों पर बहाली निकलती है और उसमें 1 लाख से ज़्यादा आवेदनकर्ता होते हैं, तो छात्रों को इतनी प्रतिस्पर्धा में तो और भी ज़्यादा मेहनत करनी चाहिए! ज़िन्दगी के 8 या 10 साल परीक्षा की तैयारी में लगाना काफ़ी नहीं! नौजवानों को पूरी ज़िन्दगी रटन्त शिक्षा में लगा देनी चाहिए भले ही पदों की भर्ती के लिए विज्ञापन सालों-साल बाद निकले, भले ही हर दूसरी परीक्षा में धाँधली हो जाये! ये चीज़ें तो भूकम्प समान प्राकृतिक आपदा है, इनमें बेचारी मोदी सरकार क्या कर सकती है? पर छात्र? उन्हें तो संयम से काम लेना चाहिए। उन्हें उत्तेजित होकर कोई ग़लत क़दम नहीं उठाना चाहिए! जैसा कि हमारे शास्त्रों में बताया गया है, “सन्तोषम परम सुखम”! तो सारे नौजवान पेट पर पट्टी बाँधे, बगलों में डिग्रियाँ दबाये सड़कों पर चप्पलें घिसें, और ज़ोर से बोलें, “सब चंगा सी!”

कुछ छात्र गलत संगत में आ जाते हैं और अधीर होकर कभी पदों की बहाली के लिए, तो कभी परीक्षा में धाँधली के ख़िलाफ़, तो कभी एलपीजी सिलिण्डर के लिए सड़कों पर उतर जाते हैं! अभी हाल में सैकड़ों की संख्या में छात्र आबादी दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े के लिए और लगातार परीक्षाओं में हो रही धाँधली के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरी। उसके बाद से देश के अलग-अलग शहरों में तमाम छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं। असल में यह कुछ लोगों द्वारा देश (यानी मोदी सरकार) में अस्थिरता पैदा करने का एक ‘षड्यंत्र’ है! ज़रूर ये पाकिस्तानी एजेण्ट होंगे! या “नक्सली” होंगे! और अगर इनमें मुसलमान भी हैं, तो वे तो सारे “बंगलादेशी” होंगे! ऐसे ही लोगों के कारण कभी लखनऊ या इलाहाबाद में एसएससी जीडी या लेखपाल की परीक्षा में धाँधली के ख़िलाफ़ सड़क पर हंगामा होता है, तो कभी पटना में बिहार पुलिस भर्ती की परीक्षा में स्पेशल ट्रेन चलाने की माँग को लेकर पुलिस पर ही पत्थरबाज़ी की जाती है! ये वे लोग हैं जो बिना मेहनत-मशक्कत किये ही सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं! इन्हें ठीक ही संज्ञा दी गयी है – कॉकरोच! असल में ये सारे के सारे कामचोर हैं और परजीवी बनकर जीने की चाहत रखते हैं! कुछ काम-धाम नहीं है, तो सड़क पर उतर जाते हैं आन्दोलनजीवी बनने! जब देश में बेरोज़गारी है ही नहीं, तो आख़िरकार ये छात्र-युवा आबादी क्यों बेकार सड़कों पर हंगामा कर रही है? देशद्रोही, पाकिस्तानी एजेण्ट कहीं के!

आज के युवाओं को देश के प्रधान सेवक से सीखना चाहिए कि कैसे जनता की सेवा में 18-18 घण्टे तक काम किया जाता है! ज़रा सोचिये, मोदी जी बढ़ती बेरोज़गारी के बारे में फ़ैल रहे “वहम” को दूर करने के लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं! वह लगातार अपने “राष्ट्रवादी” मीडिया और तमाम सरकारी उपक्रमों और आर.एस.एस. के कर्मठ कार्यकर्ताओं के ज़रिये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि बेरोज़गारी बस एक वहम है, एक मानसिक स्थिति है जिससे युवाओं को मुक्त होना है! और यह कि असल समस्या मुसलमानों और घुसपैठियों की आबादी में बढ़ोत्तरी की है, असल समस्या मज़दूरों-छात्रों-युवाओं और विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं (यानी कॉकरोचों) द्वारा “देश” (यानी मोदी सरकार) के ख़िलाफ़ रचे जाने वाले षड्यंत्र की है! लेकिन कुछ मीडिया समूह द्वारा बार-बार उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया जाता है! अब क्या करें, अन्तरराष्ट्रीय स्तर के मीडिया समूहों को मोदी सरकार अपनी गोद में बैठाने की क्षमता नहीं रखती है, इसलिए जनता के सामने कभी-कभी ऐसे लीकेज हो जाया करते हैं!

ज्ञात हो  रायटर्स (reuters) जोकि अन्तरराष्ट्रीय स्तर का एक प्रसिद्ध मीडिया समूह है, ने भारत में बेरोज़गारी की स्थिति के मोदी सरकार के हवाई दावे की पोल खोल दी। पीएलएफ़ सर्वेक्षण द्वारा जो सरकार की आधिकारिक रिपोर्ट सामने आयी, उसके अनुसार भारत में जून 2025 के दौरान बेरोज़गारी दर सिर्फ़ 5.6% थी! वार्षिक पी.एल.एफ़.एस.  रिपोर्ट के आँकड़ों  से यह नतीजा सामने आया कि 2017-18 में जो बेरोज़गारी दर 6 प्रतिशत थी, वह 2023-24 में 3.2 प्रतिशत तक पहुँच गयी। इसे गोदी मीडिया द्वारा मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रसारित किया जाने लगा। लेकिन इस उपलब्धि के पीछे की असलियत क्या थी? रायटर्स ने इस दावे को लेकर कई जाने माने स्वतन्त्र अर्थशात्रियों से राय ली। उनका कहना था कि भारत का आधिकारिक बेरोज़गारी आँकड़ा सही नहीं है। पी.एल.एफ़.एस. की रिपोर्ट में जो बेरोज़गारी दर बतायी गयी है, असल में वह उससे दोगुनी है। रायटर्स के सर्वेक्षण में शामिल 17 विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में बेरोज़गारी दर औसतन 10% है और यह 7% से 35% तक भी हो सकती है। मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एण्ड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन, जिसके तहत यह सर्वेक्षण कराया जाता है, उसने तुरन्त ही रायटर्स के इस बात का खण्डन करते हुए एक आधिकारिक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने बताया कि रायटर्स का यह विश्लेषण ग़लत है। इसका कारण उन्होंने यह गिनाया कि रायटर्स ने किसी आँकड़े पर आधारित होकर नहीं बल्कि कुछ ‘अज्ञात अर्थशास्त्रियों’ के अनुमानों को आधार बनाकर अपना विश्लेषण रखा है। क्या पता, ये सभी ‘अज्ञात अर्थशास्त्री’ मोदी सरकार के प्रति पूर्वाग्रहित होकर अपना विश्लेषण रख रहे हों! क्या पता ये भी कॉकरोच हों!

परन्तु कई तरीक़ों से आँकड़ों में “राष्ट्रवादी” फ़ेर-बदल करके अपना बचाव करने की कोशिशों के बावजूद ज़मीनी हक़ीकत “देशद्रोह” करते हुए चीख़-चीख़ कर बयान कर रही है कि महँगाई व बेरोज़गारी पहले की तुलना में अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है! पर सवाल उठता है कि आख़िरकार क्यों सरकारी आँकड़ों में यह हक़ीकत नज़र नहीं आ रही? इसलिए, सरकार के इन दावों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना ज़रूरी है! आइये, ‘मेहनती मोदी सरकार’ के इन आँकड़ों  की पड़ताल की जाये!

ये आँकड़ें झूठे हैं, ये दावा किताबी है!

पी.एल.एफ़.एस. यानी पीरियाडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे, एक नमूना-आधारित सर्वेक्षण है जो हर साल लगभग 1 लाख परिवारों का साक्षात्कार लेता है और उसके आधार पर भारत में बेरोज़गारी दर का विश्लेषण करता है। जैसा कि लेख की शुरुआत में ही बताया गया कि मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एण्ड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के तहत यह सर्वेक्षण करवाया जाता है। इसकी शुरुआत 2017 से की गयी थी। इसने 2017-18 में NSSO के पुराने पंचवर्षीय बेरोज़गारी सर्वेक्षण का स्थान ले लिया था। यह सर्वेक्षण चार मुख्य संकेतकों की रिपोर्ट करता है। पहला, श्रमशक्ति भागीदारी दर (LPFR – Labor Force Participation Rate)—यह  इस चीज़ को दर्शाता है कि काम करने योग्य आबादी का कितना बड़ा हिस्सा कार्यरत है या सक्रिय रूप से काम की तलाश में है। दूसरा, श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR- Workers Population Ratio), यानी भारत की कार्यशक्ति (जो किसी न किसी प्रकार का काम कर रही है)। यह उस आबादी के बारे में बताता है जो वास्तव में रोज़गारशुदा है। तीसरा, बेरोज़गारी  दर (UR – Unemployment Rate)—श्रमशक्ति भागीदारी दर और श्रमिक जनसंख्या अनुपात को आधार बनाकर यह उस आबादी के बारे में जानकारी देता है जो अपनी श्रमशक्ति बेचने के लिए बाज़ार में मौजूद है लेकिन उसे कोई ख़रीदार नहीं मिल रहा। यानी बेरोज़गार आबादी का वह हिस्सा होते हैं जिनके पास काम नहीं है लेकिन वे काम की तलाश में है, यानी उनकी संख्या, तथा कुल श्रमशक्ति की कुल संख्या का अनुपात। इन्हीं चार चीज़ों को आधार बनाकर पी.एल.एफ़. सर्वेक्षण से देश में बेरोज़गारी की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है।

इसमें भी बेरोज़गारी की दर को परिभाषित करने के लिए दो पैमानों का इस्तेमाल होता है। पहला, सामान्य स्थिति जोकि 365 दिनों की सन्दर्भ अवधि में बेरोज़गारी की एक साल की स्थिति को स्पष्ट करता है और दूसरा, साप्ताहिक स्थिति जोकि पिछले 7 दिनों की सन्दर्भ अवधि में बेरोज़गारी की वर्तमान साप्ताहिक स्थिति को स्पष्ट करता है।

अब आइये जानते हैं कि पी.एल.एफ़. सर्वेक्षण ने भारत के बेरोज़गारी दर के बारे में क्या विश्लेषण किया है। आप लेख में दिये ग्राफ़ में देख सकते हैं कि कैसे 2017-18 से 2024-25 आते-आते मोदी सरकार की आधिकारिक बेरोज़गारी दर कम होती गयी है। यहाँ तक कि कोरोना काल के दौरान जब मोदी सरकार द्वारा थोपे गये अनियोजित लॉकडाउन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी थी, जब नोटबन्दी से लेकर कोविड लॉकडाउन के बीच ही क़रीब 4 करोड़ लोग अपने रोज़गार से हाथ धो बैठे थे, तब भी बेरोज़गारी दर बढ़ी नहीं बल्कि कम होती गयी! जब आप “विश्वगुरू” बन जाते हैं, तो ऐसे चमत्कार होते रहते हैं! बड़े आश्चर्य की बात है कि कोरोना काल में जब कई धंधे बर्बाद हो चुके थे, जब कई उद्योग बन्द हो चुके थे और 3.2 करोड़ मज़दूर आबादी शहरों से गाँव की और लौटने को मजबूर हुई थी, ऐसी अवधि में भी बेरोज़गारी दर में बढ़ोत्तरी नहीं आयी! यह तो (नॉन-बायोलॉजिकल) अजैविक मोदी जी की कृपा का परिणाम ही हो सकता है!

वहीं दूसरी ओर, इसी साल के पी.एल.एफ़.एस. नामक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ग्रामीण श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) शहरी श्रमिक जनसंख्या अनुपात से काफ़ी ज़्यादा है। यानी शहरी इलाक़ों के मुक़ाबले ग्रामीण इलाक़ों में बेरोज़गारी दर कम है। क्या इसका मतलब यह है कि शहरों के मुकाबले गाँवों में ज़्यादा नौकरियाँ हैं? अगर हाँ, तो आख़िर ग्रामीण आबादी को रोज़गार की तलाश में शहरों में क्यों प्रवासी बनकर रहने की ज़रूरत पड़ रही है!

एक और अचम्भित करने वाली बात इस सर्वेक्षण में सामने आयी। वह यह कि ग्रामीण महिलाओं की श्रमशक्ति बाज़ार में अचानक से बढ़कर शहरों से ज़्यादा हो गयी। 2017-18 के सर्वेक्षण में जिन ग्रामीण महिलाओं का श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) 17% था वह 2024-25 में बढ़कर 39% से ज़्यादा हो गया। आख़िर कैसे शहरों के मुक़ाबले गाँव में महिलाओं की श्रमशक्ति भागीदारी दर ज़्यादा हो गयी? इसका अर्थ तो यह निकलता है कि महिलाओं को अब रोज़गार की तलाश में शहरों की ख़ाक छानने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, अब गाँव में ही रोज़गार के नये अवसर पैदा हो रहे हैं! भारत में 2026 के बेरोज़गारी सर्वेक्षण में सबसे ख़ास बदलाव महिलाओं की श्रमशक्ति भागीदारी दर (LFPR) में बढ़ोत्तरी थी। 2017-18 के सर्वेक्षण में यह 23.3% से बढ़कर 2024-25 में लगभग 42% हो गया। भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में इतने कम समय में इतना बड़ा बदलाव, अचम्भित करने वाला है।

वहीं दूसरी ओर देखें तो पिछली बार के पी.एल.एफ़. सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में बेरोज़गारी दर मात्र 3.2% थी जोकि 2017-18 के मुक़ाबले लगभग आधी हो गयी! इसी दौरान बाज़ार में अपनी श्रमशक्ति को बेचने वालों की आबादी में भी बढ़ोत्तरी हो रही थी। जैसाकि आप नीचे दिये ग्राफ़ में देख सकते हैं कि 2017-18 में जो श्रमशक्ति भागीदारी दर 50% थी, वह 2024-25 के साल में 61% हो गयी और उसमें भी रोज़गारशुदा श्रमिकों का प्रतिशत 59% था। इससे ऐसा प्रतीत हो सकता है कि बाज़ार में श्रमशक्ति के बढ़ने के बावजूद भी लोगों के लिए रोज़गार की कमी नहीं हो रही! यानी मोदी राज में रोज़गार के नये-नये अवसरों की बरसात हो रही है! लेकिन सवाल उठता है कि अगर सरकार नये रोज़गार सृजित कर रही है, तो आख़िरकार एक बड़ी छात्र-युवा आबादी सड़कों पर क्यों है?

ये वे बिन्दु हैं जोकि इन आधिकारिक आँकड़ों की सच्चाई पर बड़े सवाल खड़े करते हैं। दरअसल ये सारे चमत्कार हमारे नॉन-बायोलॉजिकल मोदी जी का कमाल हैं! ईश्वर का नया अवतार लेकर पैदा हुए हमारे प्रधानमंत्री बेरोज़गारी को चुटकी बजाते ही ख़त्म कर देते हैं! कैसे ख़त्म करते हैं? सरकार आधिकारिक आँकड़ों के विश्लेषण में ही चार सौ बीसी करके बेरोज़गारी की असल दर को छुपा लेती है, इस प्रकार जब बेरोज़गारी की स्थिति को बयान करने वाले आँकड़े ही नहीं रहते, तो बेरोज़गारी कैसे रहेगी?!

जी हाँ! सरकारी विभाग द्वारा पी.एल.एफ़. सर्वेक्षण के विश्लेषण में जिस पद्धति का इस्तेमाल किया गया है वह अपने आप में सन्देहास्पद है! असल में बेरोज़गारी  की हक़ीकत को छुपाने के लिए सरकार ने अपने विश्लेषण में रोज़गार की परिभाषा को ही बदल दिया! इस पूरे सर्वेक्षण में उस व्यक्ति को रोज़गारशुदा माना गया है जिसने हफ़्ते में कम से कम एक घण्टा कोई भी काम किया हो! जब एक साल की अवधि में बेरोज़गारी दर का विश्लेषण किया जाता है, तो उसमें 365 दिन में किसी व्यक्ति को यदि 30 दिनों के लिए भी कोई काम मिला हो, तो उसे सरकारी आँकड़ो में रोज़गारशुदा माना जायेगा! इस तरीक़े से रोज़गार का आकलन करना जनता के साथ एक भद्दा मज़ाक है। ज़ाहिर हैं कि रोज़गार की इस परिभाषा की वजह से देश की बेरोज़गारी दर कम ही प्रतीत होगी! रोज़गार का अर्थ होता है रोज़ का पक्का काम और उसका पक्का भुगतान, यानी 365 में से अवकाश के दिनों को छोड़कर सभी दिन काम मिलने पर ही एक व्यक्ति को रोज़गारशुदा माना जाना चाहिए। ज़ाहिर है, जो व्यक्ति साल में मात्र 30 दिन या सप्ताह में मात्र एक घण्टे काम का वेतन पाता होगा, वह किस प्रकार अपने या अपने परिवार का भरण-पोषण कर पायेगा! जब तक पक्की नौकरी को रोज़गार की परिभाषा का हिस्सा नहीं बनाया जायेगा, तब तक बेरोज़गारी की असल तस्वीर सामने नहीं आ सकती।

ज्ञात हो कि भारत की लगभग 93% कार्यशक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करती है, लेकिन इस सरकारी सर्वेक्षण में उनके काम करने की स्थिति, काम के घण्टे, औसत मज़दूरी या वेतन और काम की प्रकृति का कोई आँकड़ा मौजूद नहीं। सरकार के लिए अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली आबादी का अस्तित्व ही नहीं है! सरकार द्वारा मान्य रोज़गार की परिभाषा के अनुसार अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी, ठेका व कैजुअल मज़दूरों की एक बड़ी संख्या, जिनके पास कोई रोज़गार सुरक्षा नहीं है, को भी रोज़गारशुदा क़रार दे दी गया है। वहीँ दूसरी ओर 2025 के सर्वेक्षण में श्रमशक्ति भागीदारी दर (LFPR)  में जिस बढ़ोतरी को दिखाया गया है, उसका मुख्य कारण तथाकथित स्वरोज़गार में हुई वृद्धि है। लेकिन इन स्वरोज़गार करने वालों की स्थिति क्या है? यदि कोई व्यक्ति ढंग का रोज़गार न मिलने की सूरत में कहीं ठेला लगाकर या चाय स्टॉल लगाकर या फ़िर ई-रिक्शा/ऑटो चलाकर मुश्किल से अपनी रोज़ी कमा रहा है, या कोई छोटी जोत का ग़रीब किसान, जिसकी जोत से उसके खाने-पीने व दवा-इलाज का बुनियादी ख़र्च भी मुश्किल से जुट पा रहा हो, तो ऐसे तमाम व्यक्तियों को स्वरोज़गार के नाम पर रोज़गारशुदा मानना कितना वाजिब है?! जिनको नौकरी नहीं मिलती, वे सारे लोग आत्महत्या थोड़े ही कर लेते हैं! वे तथाकथित स्वरोज़गार कर किसी तरह से भुखमरी रेखा पर जीवित रहते हैं और मानवीयता से रिक्त पाशविक जीवन जीने को मजबूर होते हैं।

असल में सरकार का यह पूरा विश्लेषण सांख्यिकीय जोड़-तोड़ से ज़्यादा कुछ नहीं है! ना तो यह नौकरी के प्रकार पर कोई स्थिति स्पष्ट करता है और ना ही औसत मज़दूरी या वेतन की स्थिति के बारे में या रोज़गार की सुरक्षा के बारे में कोई जानकारी देता है। जब सरकार कहती है कि श्रमशक्ति भागीदारी दर (LFPR) और श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) बढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि नये रोज़गार का सृजन हो रहा है! हमें इसकी पड़ताल करनी होगी कि आख़िर क्या बढ़ रहा है—वैतनिक काम या अवैतनिक काम?!

मोदी सरकार के चमत्कारी आँकड़े!

पी.एल.एफ़.एस. की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, बिना वेतन वाले काम को स्वरोज़गार की श्रेणी में रखा जा रहा है। कई लोग जो परिवार के सामूहिक श्रम में हिस्सेदारी करते हैं, उनके पुनरुत्पादन सम्बन्धी काम को भी रोज़गार माना जा रहा है। गाँव में काम करने वाली ज़्यादातर औरतें ऐसे ही पारिवारिक काम की श्रेणी में आती हैं। कई औरतें पारिवारिक खेती के काम में हाथ बँटाती हैं, उन सबको सरकार रोज़गारशुदा मानकर अपने आँकड़े प्रस्तुत कर रही है। यही वजह है कि गाँव में महिलाओं की श्रमशक्ति भागीदारी दर (LPFR) शहरों से ज़्यादा है! असल में यह गाँव में रोज़गार की बेहतर स्थिति को नहीं दिखाता है बल्कि उल्टे महिलाओं के उत्पीड़न को और कई मामले में उनके शोषण को छिपाने का काम करता है। शहरों में आम तौर पर श्रमशक्ति भागीदारी दर में कमी की एक वजह यह भी है कि बेतहाशा बढ़ती महँगाई के इस दौर में शहरों में जीवनयापन सम्भव नहीं रह गया है, जिस वजह से हज़ारों की तादाद में एक बड़ी मज़दूर आबादी अपने गाँव वापस लौटने को मजबूर हुई। असल में जिस रफ़्तार से महँगाई बढ़ रही है, उस अनुपात में वेतन में बढ़ोत्तरी नहीं हो रही। उत्तर प्रदेश की बात की जाये तो वहाँ 2012 से न्यूनतम मज़दूरी में कोई वृद्धि नहीं की गयी, जबकि गैस सिलिण्डर के बढ़ते दाम और पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दाम की वजह से मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी में भयानक कमी आयी है। लोगों के दो जून रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल से हो पा रहा है, बच्चों की पढ़ाई और दवा-इलाज तो दूर की बात है! ऐसे में गुडगाँव-नोएडा से लेकर कई जगहों पर मज़दूरों का गुस्सा फूटना वाजिब था। बीते तीन-चार महीने में पानीपत, सिडकुल, बरौनी, गुडगाँव, नोएडा से लेकर पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वतःस्फूर्त तरीक़े से वेतन-बढ़ोत्तरी की माँग को लेकर मज़दूरों के आन्दोलन उठ खड़े हुए। वही दूसरी ओर देश भर में हज़ारों की संख्या में छात्रों-नौजवानों का गुस्सा भी सड़कों पर देखने को मिल रहा है। आज बेरोज़गारी की सबसे ज़्यादा मार पढ़ी-लिखी छात्र आबादी झेल रही है। उम्र के हिसाब से बेरोज़गारी की समस्या 15 से 29 साल की छात्र-युवा आबादी में सबसे ज़्यादा है। आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक, जब जून 2025 में बेरोज़गारी दर 5.6% थी, तब 15-29 साल के युवाओं में यह 15.3% थी। इसमें भी पढ़े-लिखे युवा जिन्हें मध्य या उच्च शिक्षा हासिल है, उनमें बेरोज़गारी दर सभी उम्र के औसत से 3 से 4 गुना ज़्यादा है। सरकारी सर्वेक्षण की रिपोर्ट से यह बात भी साफ़ होती है कि स्नातकोत्तर उत्तीर्ण युवाओं को स्नातक किये युवाओं के मुक़ाबले ज़्यादा बेरोज़गारी का सामना करना पड़ता है। शहरी युवतियों का और भी बुरा हाल है! उनके बीच बेरोज़गारी दर 20% से भी ज़्यादा है। आपको बताते चलें कि यह मोदी सरकार के चमत्कारी अजैविक सरकारी सर्वेक्षण के आँकड़े हैं! अब सोचिये कि युवाओं में बेरोज़गारी दर की असल तस्वीर क्या होगी! ऐसा इसलिए है क्योंकि अपनी शिक्षा के स्तर के अनुसार युवाओं को नौकरियाँ नहीं मिल रहीं। एक बड़ी आबादी इस उम्मीद में सरकारी नौकरियों की तैयारी में सालों बिता देती हैं कि उसका भविष्य किसी तरह सुरक्षित हो सके। लेकिन आज सरकारी नौकरियाँ भी ख़त्म हो चुकी हैं। मोदी सरकार की निजीकरण की नीतियों का नतीजा है कि सभी सरकारी पदों को ख़त्म किया जा रहा है। जो बचे-खुचे सरकारी पद खाली भी हैं, उनमें बहाली नहीं निकाली जाती, और बहाली निकलती भी है तो वह पेपरलीक की भेंट चढ़ जाती है। मोदी सरकार के राज में जब से एनटीए के तहत परीक्षा आयोजित करवाने का काम शुरू हुआ है, तब से पेपरलीक एक आम परिघटना बन चुकी है। लगभग 2 करोड़ छात्र आबादी पेपरलीक की वजह से बुरी तरह से प्रभावित हुई है. हताशा- निराशा में कई छात्र आत्महत्या करने को मजबूर हुए हैं। 2023 में 18 से 45 वर्ष की आयुवर्ग में आत्महत्या करने वालों की संख्या 1 लाख से ज़्यादा थी! लेकिन यह आत्महत्या नहीं बल्कि व्यवस्था द्वारा की जा रही हत्याएँ हैं। लेकिन इन निराशाओं के बावजूद भी हमारा यह समय अच्छा है क्योंकि यह निर्णायक है। आख़िर कब तक मोदी सरकार की पूँजीपरस्त नीतियों की वजह से बेरोज़गारी  और महँगाई की भयंकर मार झेल रही एक बड़ी मज़दूर-कर्मचारी-छात्र-युवा आबादी चुप रहती? आज ईरान के ऊपर अमेरिका व सेटलर औपनिवेशिक हत्यारे राज्य इज़रायल द्वारा थोपे गये साम्राज्यवादी युद्ध की वजह से और अपनी विफल विदेश नीति की वजह से मोदी राज में जिस आर्थिक संकट का सामना देश को करना पड़ रहा है, उसने अभूतपूर्व रूप से महँगाई, बेरोज़गारी और ग़रीबी में वृद्धि की है! ऐसी स्थिति में मेहनतकश जनता के अलग-अलग हिस्से स्वतःस्फूर्त रूप से अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं और मोदी सरकार की पूँजीपरस्त नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। फ़ासीवादी हुक़ूमत पूँजी की इतनी बड़ी ताक़त के बावजूद, बुर्जुआ राज्य मशीनरी के सभी ढाँचो में फ़ासीवादी घुसपैठ के बावजूद, और संघ के इतने बड़े कैडर आधारित ढाँचे के बावजूद, जनता को पाकिस्तान, चीन, मन्दिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम जैसे नक़ली मुद्दों पर गुमराह करने में वांछित सफलता हासिल नहीं कर पा रही है! यह इस बात की ओर संकेत कर रहा है कि फ़ासीवाद की काली घटाएँ जनउभार के इस समुद्र में अन्तत: डूब जाएँगी। इसमें वक़्त लग सकता है, लेकिन आप कुछ लोगों को कुछ समय बेवकूफ़ बना सकते हैं, लेकिन सारे लोगों को आप सारे वक़्त बेवकूफ़ नहीं बना सकते हैं!

ठीक इसीलिए आज सत्ता में बैठी फ़ासीवादी सरकार लगातार हो रहे इन जनउभारों से डरी हुई है और उसका भयंकर रूप से दमन कर रही है। लेकिन हज़ारों कोशिशों के बावजूद वह उठ रहे इस विरोध की आवाज़ को रोक नहीं पा रही। लेकिन आज यह भी ज़रूरत है कि स्वतःस्फूर्तता से आगे बढ़कर छात्र-युवा और मज़दूर आबादी अपने आन्दोलन को संगठित रूप दे और इसे व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में बदल दे। आज किसी भी किस्म के फ़ासीवादी उभार का स्थान बुर्जुआ जनवाद नहीं ले सकता। समाजवादी क्रान्ति के साथ ही आज के दौर में फ़ासीवाद का अन्त सुनिश्चित किया जा सकता है। इसलिए आज उठने वाले इन स्वतःस्फूर्त आन्दोलनों में क्रान्तिकारी शक्तियों को एक सही सर्वहारावर्गीय राजनीतिक लाइन को स्थापित करना होगा और जनता के इन संघर्षों को संगठित रूप देना होगा। तभी ही हम अपने संघर्षों की जीत को सुनिश्चित कर सकते हैं और इसे व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई तक पँहुचा सकते हैं।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2026