बिगुल मज़दूर दस्ता ने बीते 21 दिसम्बर को जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र की मज़दूर बस्ती, रामि रेड्डी नगर में मज़दूर बिगुल अख़बार का घर-घर अभियान चलाया। अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने गोदी मीडिया द्वारा फैलाए जा रहे झूठ का पर्दाफ़ाश करते हुए मज़दूर-विरोधी चार लेबर कोड के बारे में मज़दूरों को अवगत कराया। गोदी मीडिया मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए इन काले क़ानूनों को मज़दूरों के लिए लाभकारी बताकर उनका ज़ोर-शोर से प्रचार कर रही है। लेकिन असलियत यह है कि ये चार लेबर कोड फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा मज़दूरों के अधिकारों पर किया गया अब तक का सबसे बड़ा हमला हैं।
ये क़ानून पूँजीपतियों को मज़दूरों का क़ानूनी तौर पर शोषण करने की खुली छूट देते हैं। मोदी सरकार ने न्यूनतम वेतन की क़ानूनी व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए ‘फ़्लोर लेवल मज़दूरी’ लागू की है, जिसके तहत प्रतिदिन की मज़दूरी मात्र 178 रुपये तय की गई है। अब पूँजीपतियों को मज़दूरों से बिना ओवरटाइम भुगतान किए 8 घंटे से ज़्यादा काम लेने की छूट मिल गई है। ‘फ़िक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट’ के ज़रिए स्थायी रोज़गार के अधिकार को छीना गया है और ठेका प्रथा को पूरी तरह क़ानूनी बना दिया गया है। इन नए क़ानूनों के तहत पूँजीपतियों और सरकार के लिए मज़दूरों को काम करने की मानवीय कार्यस्थल परिस्थितियाँ प्रदान करना, ईएसआई, पीएफ़, ग्रेच्युटी, पेंशन और मातृत्व लाभ देना क़ानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं रह गया है।
इन फ़ासीवादी चार लेबर कोड के ज़रिए मज़दूरों के हड़ताल करने के अधिकार पर क़ानूनी धाराएँ लगाकर उनके मोलभाव करने के अधिकार को भी छीन लिया गया है। अब मज़दूरों को हड़ताल करने के लिए 60 दिनों का नोटिस देना होगा और वे नोटिस देने के 14 दिन बाद ही हड़ताल कर सकते हैं। इन 60 दिनों के दौरान यदि मालिक और प्रशासन के साथ वार्तालाप चलता रहता है, तब भी हड़ताल करना ग़ैर-क़ानूनी होगा। ऐसे में मज़दूरों की ज़िन्दगी और बदतर हो जाएगी।
बिगुल मज़दूर दस्ता ने चार लेबर कोड की असलियत को उजागर करते हुए मज़दूरों से आह्वान किया कि वे संगठित और एकजुट होकर इन फ़ासीवादी कोड को वापस लेने के लिए मोदी सरकार पर अनिश्चितकालीन आम हड़ताल के ज़रिए दबाव बनाएँ।
 

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