बिगुल मज़दूर दस्ता ने गत 20 फ़रवरी को हैदराबाद के जीडीमेटला औद्योगिक क्षेत्र के सुभाष नगर की मज़दूर बस्ती में क्रांतिकारी अख़बार “मज़दूर बिगुल” का प्रचार अभियान चलाया।
अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने मज़दूरों को क्रांतिकारी मज़दूर संगठन बनाने में क्रांतिकारी अख़बार की ज़रूरत को समझाया। मज़दूर बिगुल किसी पूँजीपति अख़बार की तरह विज्ञापन के दम पर नहीं चलता है, बल्कि यह सिर्फ आम मेहनतकश आबादी के बलबूते चलता है।
कार्यकर्ताओं ने मज़दूरों को चार लेबर कोड के बारे में बताया कि आज़ादी के बाद ये मज़दूरों के अधिकारों पर सबसे बड़ा हमला हैं। गोदी मीडिया झूठा प्रचार करते हुए कहती है कि अब श्रम क़ानून सरल किए गए हैं, पर असलियत यह है कि इससे मज़दूरों के सालों से लड़कर प्राप्त किए गए हर अधिकार छीन लिए जाएंगे, जैसे आठ घंटे का कार्यदिवस, दुगनी दर पर ओवरटाइम, ESI, PF ताकि पूंजीपतियों को मज़दूरों से मुनाफ़ा निचोड़ने की खुली छूट मिल सके। साथ ही, यूनियन बनाने और हड़ताल करने का अधिकार भी क़ानूनी तौर पर छीना जा रहा है।
इन लेबर कोड के स्त्री-विरोधी चरित्र पर भी बात की गई, जो “समानता” का ढोंग करते हुए औरतों को रात में काम करने पर मजबूर करने जा रहा है, जबकि उनकी सुरक्षा के प्रबंध के संबंध में कोई योजना नहीं है। बस्ती की कई औरतों ने कार्यकर्ताओं को बताया कि किस प्रकार उन्हें समान काम के लिए पुरुषों से कम दिहाड़ी मिलती है।
बातचीत के दौरान एक भयावह मामला सामने आया, जिसमें सुभाष नगर के कुछ ठेकेदार कई मज़दूरों को दूर इलाके में ले जाकर कई दिनों तक बिना मज़दूरी दिए काम करवाते रहे। मज़दूर आज जिस असुरक्षित स्थिति में काम करने को मजबूर हैं, उससे साफ़ नज़र आता है कि भाजपा और कांग्रेस सरकारों के “विकास” के दावे वास्तव में मालिकों और ठेकेदारों के लिए हैं।
एक महिला मज़दूर ने पूछा कि जब एक कारख़ाने में 20 से भी कम मज़दूर काम करते हैं, तो हड़ताल कैसे संभव होगी। हमने बताया कि आज के दौर में इलाकाई या पेशागत आधार पर यूनियन बनाने पर ज़ोर देने की ज़रूरत है। हड़ताल भी तभी संभव हो पाएगी।
इस प्रकार के अभियान के साथ बिगुल मज़दूर दस्ता मज़दूरों की बैठक भी आयोजित करता है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए कई मज़दूरों ने अपने संपर्क साझा किये।
 

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