दिल्ली के शाहाबाद डेरी में मज़दूर बस्तियों के बगल में बनाये गये श्मशान को हटाने का संघर्ष और सरकारी तंत्र का मकड़जाल!
– प्रियम्वदा
कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान सरकार की बदइंतज़ामी ने हजारों लोगों की असमय जान ली। मरने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि लाशों के लिए जगह कम पड़ गयी। कहीं लाशों को नदियों में बहाया गया तो कहीं नये-नये शमशान खोले जा रहे थे। ऐसा ही एक श्मशान अप्रैल महीने में उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के शाहाबाद डेरी के रिहायशी इलाक़े में बनाया गया। तब दिल्ली में कोविड से मरने वालों की संख्या 4 से 5 हज़ार तक बतायी जा रही थी (ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अधिक बदतर थी)। दिल्ली सरकार की मंज़ूरी के बाद शुरू हुए इस श्मशान में आये दिन तकरीबन 50 से 60 लाशें जलायी जा रही थीं, जिससे वहाँ रहने वाली आबादी का साँस लेना तक दूभर हो गया था।
शाहाबाद डेरी में रहने वाली बहुसंख्यक आबादी मज़दूरों की है, उनकी रिहायश की जगह पर श्मशान बनाना बेहद अमानवीय है। अप्रैल से मई मध्य तक हालत इतनी भयावह थी कि लाशों से उठने वाला धुआँ लोगों के खाने, पीने के पानी तक में मिल रहा था। बारिश और ख़राब मौसम के दौरान अधजली लाशों को कुत्ते नोच-नोच कर लोगों के घरों-गलियों तक छोड़ जा रहे थे। प्रशासन की लापरवाही इस हद तक थी कि पीपीई किट से लेकर मास्क आदि खुले में फेंके जा रहे थे जो आगे चलकर आसपास संक्रमण फैलने का कारण भी बने।
इस दौरान जनप्रतिनिधियों से कई बार शिकायत करने पर भी किसी ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इलाके के पार्षद और विधायक दोनों ही आम आदमी पार्टी के हैं, मगर इस गम्भीर मसले पर तुरन्त कार्रवाई करने की जगह ये लोगों की ज़िन्दगियों से खिलवाड़ करते रहे। मुख्यमंत्री आवास तक अपनी बात ले जाने, ज्ञापन सौंपने के बावजूद केजरीवाल सरकार की प्राथमिकताओं में केंद्र के साथ तू नंगा-तू नंगा का खेल ही चलता रहा।
भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी के नेतृत्व में लगातार जनदबाव बनाये जाने के बाद इलाके के पार्षद श्मशान के आसपास के क्षेत्र का मुआयना करने पहुँचे और ज़िम्मेदार अफसरों से बातचीत करके रास्ता निकालने की बात कहने को मजबूर हुए। लेकिन वहाँ से निकलने के बाद पार्षद महोदय छूमन्तर हो गये और फिर लोगों की कोई सुध नहीं ली। बवाना विधानसभा क्षेत्र में आने वाले इस इलाके के विधायक ने डीडीए और एमसीडी को इसका ज़िम्मेदार ठहराते हुए इस पूरे मामले से ही अपना पल्ला झाड़ लिया।
मज़दूर पार्टी द्वारा जब इस मामले के ज़िम्मेदार अफ़सरों को घेरा गया तो नौकरशाही का भयंकर मकड़जाल सामने आया। उत्तर पश्चिमी दिल्ली के ज़िलाधिकारी से बात करने पर पता चला कि डीडीए की ज़मीन पर श्मशान के निर्माण का काम किया गया है, इसलिए इस मसले में डीडीए ही कुछ कर सकती है। डीडीए के अफ़सरों से मिलने पर ये बताया गया कि डीडीए ने चूँकि अपनी ज़मीन एमसीडी को सौंप दी है, इसलिए अब वह इसमें कुछ नहीं कर सकते। आगे एमसीडी के हेल्थ ऑफ़िसर ने केजरीवाल सरकार और डीडीए के उच्च अधिकारियों पर इसका ठीकरा फोड़ते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया।
मालूम हो कि केन्द्र सरकार के मातहत आने वाली एमसीडी की फंडिंग और दिल्ली सरकार की मंज़ूरी से श्मशान के काम को आगे बढ़ाया जा रहा है।
इस दौरान डीडीए से लेकर एमसीडी और केजरीवाल सरकार की मिलीभगत ने मामले को बस एक टेबुल से दूसरे टेबुल भेजने का काम किया और यह दिखा दिया को उन्हें वहाँ रह रहे मज़दूरों की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं है। डीडीए ने बताया कि मज़दूरों की झुग्गियाँ अनधिकृत होने की वज़ह से उनके दस्तावेज़ों में वहाँ रह रहे लोगों की कोई गिनती नहीं है, इसलिए उनकी समस्या भी अधिकारियों के लिए मौजूद ही नहीं है।
यह बात एक बार फिर साफ़ हो गयी कि मज़दूरों-मेहनतकशों की ज़िन्दगी सरकार और प्रशासन के लिए महज़ एक गिनती, एक संख्या मात्र है। इस देश में 18 करोड़ लोग जो झुग्गियों में रहते हैं, 18 करोड़ लोग जो फुटपाथों पर सोते हैं वे इस व्यवस्था में दोयम दर्जे के नागरिक हैं। अपने ख़ून-पसीने से इस देश की सम्पत्ति खड़ा करने वाली मज़दूर आबादी का अस्तित्व बस इतना ही है कि वह अपनी ज़िन्दगी दाँव पर लगाकर चन्द मुट्ठीभर लोगों के लिए दौलत पैदा करती रहे।
भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी द्वारा लगातार एमसीडी के अधिकारियों, उत्तरी दिल्ली के कमिश्नर पर दबाव बनाने के बाद श्मशान में आ रही लाशों की संख्या काफ़ी कम हुई और पीपीई किट से लेकर अन्य सामग्रियों को डिस्पोज़ करने का स्थान भी सुनिश्चित किया गया। लेकिन ये महज़ एक आंशिक जीत है, संघर्ष अभी भी जारी है। सरकार और प्रशासन की इन आपराधिक लापरवाहियों और मज़दूर-विरोधी रवैये के खिलाफ़ आज ज़रूरत है कि इलाके में लोगों द्वारा चुनी हुई जन कमिटियों का निर्माण किया जाये जो संघर्ष के रास्ते तय करने के साथ-साथ अपने गली-मोहल्ले की ज़रूरतों, दिक्कतों पर फैसला लें।
मज़दूर बिगुल, जून 2021














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