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बाढ़, बेशर्म सरकार और संवेदनहीन प्रशासन का क़हर झेलती जनता

जैसे-जैसे मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था ‘विकास’ की नयी ऊँचाइयों पर पहुँच रही है, उसी अनुपात में जनता के जीवन में चलने वाली ‘विनाशलीला’ और ज़्यादा भयंकर रूप लेती जा रही है। इस विनाशलीला का एक दृश्य अगस्त के महीने में इलाहाबाद शहर में गंगा-यमुना के इलाक़े में आयी बाढ़ के रूप में सामने आया। गंगा और यमुना जैसी दो बड़ी नदियों और कई छोटी नदियों का शहर होने के चलते इस बाढ़ का क़हर जब टूटता है, तो इलाहाबाद की बहुत बड़ी आबादी उसका शिकार होती है। इस बार भी गंगा और यमुना के तटवर्ती इलाक़े, ससुर खदेरी और टौंस नदी के किनारे रहने वाली आबादी इस क़हर का शिकार बनी। बड़े पैमाने पर लोगों के काम-धन्धे का नुक़सान हुआ और बहुत से लोग विस्थापित हुए।

(अर्द्ध)कुम्भ : भ्रष्टाचार की गटरगंगा और हिन्दुत्ववादी फ़ासीवाद के संगम में डुबकी मारकर जनता के सभी बुनियादी मुद्दों का तर्पण करने की कोशिश

कुम्भ के नाम पर पूरे इलाहाबाद का भगवाकरण कर दिया गया है। भारतीय संस्कृति (जिसमें कबीर, दादू, रैदास, आदि शामिल नहीं हैं) को पुनर्जागृत करने के नाम पर गंजेड़ी-नशेेड़ी नागा बाबाओं, सामन्ती सामाजिक सम्बन्धों को गौरवान्वित करती हुई तस्वीरों और संघ से जुड़े तमाम फ़ासिस्टों की तस्वीरों से पूरे इलाहाबाद को रंग दिया गया है, जो आम जनता के बीच इस बात को स्थापित कर रहा है कि हर समस्या का समाधान अतीत में और हिन्दुत्व में है और अपने इस मिशन में संघी एक हद तक सफल भी हो रहे हैं।