Category Archives: आपस की बात

मज़दूर बिगुल के सभी पाठकों और शुभचिन्तकों से…

दोस्तो, ‘मज़दूर बिगुल’ जिस काग़ज़ पर छपता है, उसकी क़ीमत में पिछले चार महीनों में लगभग 70 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो गयी है। अख़बार की लागत में प्रति कॉपी एक रुपये से ज़्यादा का इज़ाफ़ा सिर्फ़ पिछले कुछ महीनों में हो गया है। इसके पहले भी छपाई की लागत लगातार बढ़ती रही है। ख़ासकर काग़ज़ की क़ीमतें तो पिछली वर्ष से ही बढ़ती रही थीं। अभी इनके और बढ़ने की सम्भावना है। छपाई और वितरण की अन्य लागतें भी काफ़ी बढ़ी हैं।
‘मज़दूर बिगुल’ सैकड़ों व्हॉट्सऐप ग्रुपों, क़रीब 30,000 पतों वाली ईमेल लिस्ट, वेबसाइट और फ़ेसबुक के ज़रिए हज़ारों पाठकों तक पहुँचता है, लेकिन हमारे सबसे मूल्यवान पाठक वे हैं जिनके हाथों में अख़बार की छपी प्रतियाँ पहुँचती हैं। हर महीने कभी 5000, कभी 6000 प्रतियाँ ही हम छाप पाते हैं जिनका एक छोटा हिस्सा डाक से सदस्यों को भेजा जाता है। ज़्यादातर प्रतियाँ विभिन्न शहरों में मज़दूरों की बस्तियों या कारख़ाना इलाक़ों में कार्यकर्ताओं के ज़रिए वितरित होती हैं।

मोदी और केजरीवाल के सारे दावे हवाई हैं

मेरा नाम करन है। मैं दिल्ली के करावल नगर इलाक़े में रहता हूँ। मैं दिल्ली के स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग से बीए तृतीय वर्ष का छात्र हूँ। मैं अपने बुज़ुर्ग दादा-दादी के साथ रहता हूँ। मेरे दादा गार्ड के तौर पर काम करते थे, अब काफ़ी उम्र हो जाने के कारण वे काम कर पाने में असमर्थ हैं। दिल्ली की गलियों में ताउम्र काम करने के बाद अभी तक दिल्ली सरकार की ओर से उन्हें कोई वृद्धा पेंशन नहीं दी जा रही है। मैंने भी सालों सरकारी दफ़्तर के चक्कर काटे, कई दिन बाद पता चला कि 2018 से ही दिल्ली में वृद्धा पेंशन की योजना बन्द है।

मज़दूर बिगुल के सभी पाठकों और शुभचिन्तकों से…

‘मज़दूर बिगुल’ जिस काग़ज़ पर छपता है, उसकी क़ीमत में पिछले फ़रवरी अंक के बाद से प्रति रीम न्यूनतम 160 रुपये की बढ़ोत्तरी हो गयी है। 540 रुपये रीम से सीधे 700 रुपये (कहीं-कहीं 750 भी है)। यानी अख़बार की लागत में प्रति कॉपी लगभग 80-85 पैसे का इज़ाफ़ा सिर्फ़ पिछले एक महीने में हो गया है। हम सबसे मामूली क़िस्म का न्यूज़प्रिण्ट इस्तेमाल करते हैं। थोड़े बेहतर क़िस्म का न्यूज़प्रिण्ट तो और भी महँगा होकर 950 से लेकर 1050 रुपये प्रति रीम तक जा पहुँचा है।

एकजुट संघर्ष ही रास्ता है

मेरा नाम रौशन कुमार है। मैं एक बैंक में कार्यरत हूँ। मैं पिछले कई महीनों से मज़दूर बिगुल अख़बार पढ़ता आ रहा हूँ। हालाँकि अब तो मुझे बिगुल अख़बार का बड़ी ही बेसब्री के साथ इन्तज़ार रहता है। इसमें मौजूदा हालात और विभिन्न मसलों पर आने वाला दृष्टिकोण काफ़ी विचारोत्तेजक और आँखें खोलने वाला होता है। सच कहूँ तो मैं शहीद भगतसिंह का दीवाना था और इसी कारण से मैंने उनके विचारों के बारे में और फिर उनके सपने ‘समाजवाद’ के बारे में जानना-पढ़ना शुरू किया था।

आपस की बात

मेरा नाम अमित है। मैं हरियाणा के ज़िला हिसार के खरकड़ा गाँव के एक ग़रीब दलित मज़दूर परिवार से ताल्लुक़ रखता हूँ। मैंने जातिगत भेदभाव भी झेला है। फ़िलहाल मैं कॉलेज छात्र हूँ लेकिन ज़रूरत पड़ने पर मैं मज़दूरी भी करता हूँ। मेरे रिश्तेदार के गाँव में बिगुल मज़दूर दस्ता के प्रचार अभियान के दौरान मई 2021 में मुझे मज़दूर बिगुल का अंक पहली बार मिला था। मुझे बिगुल पढ़कर ऐसा अहसास हुआ जैसे इसमें मेरे ही मनोभावों को अभिव्यक्त किया गया हो।

मज़दूर बिगुल अख़बार है मज़दूरों का हथियार

प्रिय साथि‍यों, दरअसल आप सब जानते हैं कि आज के इस समाज में मज़दूर वर्ग की हालत या दशा बहुत ज़्यादा ख़राब हो चुकी है। हर साल पता नहीं कितने ही मज़दूर भूख-बदहाली के कारण मौत के मुँह में समा जाते हैं। और सबसे अहम चीज़ है अपनी माँगों को लेकर अपने अधिकारों को लेकर, अपनी स्वतंत्रता को लेकर मज़दूर आबादी शिक्षित नहीं है और वह इसलिए दबायी जा रही हैं, कुचली जा रही है तो सबसे पहले तो मज़दूरों को उनके हक़-अधि‍कारों से परि‍चि‍त कराना हम सबका सर्वप्रथम कर्तव्य बनता है।

आपस की बात

आपस की बात – जगदेव, बणी गांव, सिरसा एक का नाम है रामलाल और एक मोहम्मद नूर। सीमेण्ट के एक कारख़ाने में दोनों हैं मज़दूर।। दोनों के चूल्हों की हालत…

मेरी देशभक्ति का घोषणापत्र

मैं एक भारतीय हूँ। मैं इस देश से प्यार करती हूँ।
मैं इस देश से प्यार करती हूँ, यानी इस देश के लोगों से प्यार करती हूँ।
मैं इस देश के सभी लोगों से प्यार नहीं करती। मैं इस देश में अपनी मेहनत से फसल पैदा करने वाले, कारखानों में काम करने वाले, खदानों में काम करने वाले, बाँध, सड़क और बिल्डिंगें बनाने वाले, स्कूलों-कालेजों में पढ़ने-पढ़ाने वाले और ऐसे तमाम आम लोगों से और उनके बच्चों से प्यार करती हूँ।

डिलीवरी बॉय का काम करने वाले मज़दूरों का शोषण

मैं सचिन कुमार, उम्र 21 साल, उत्तर पूर्वी दिल्ली के करावल नगर इलाक़े में रहता हूँ। मैं अलग-अलग कम्पनियों के बिस्कुट, सेवईं, मैक्रोनी और पास्ता दुकानों पर सप्‍लाई करने का काम करता हूँ। मैं सुबह 10 बजे तक काम पर पहुँच जाता हूँ, वहाँ पहुँचने पर मालिक मुझे दुकानों पर पहुँचाने वाले सामान की लिस्‍ट देता है और फिर मुझे गोदाम से सारा सामान बाहर निकालना होता है, जिसका वज़न लगभग 150 से 200 किलो होता है।

किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में मेरे गाँव के कुछ अनुभव

अभी हाल ही में मेरा गाँव जाना हुआ (जो उत्तर प्रदेश के फै़ज़ाबाद ज़ि‍ले में है)। मुझे पहले थोड़ा आश्चर्य हुआ कि गाँव में या रास्ते में बस और टैक्सी में लोगों के बीच किसान आन्दोलन की कोई सुगबुगाहट या चर्चा तक नहीं सुनाई पड़ी। जबकि शहरों में “अन्नदाताओं के आन्दोलन” को लेकर मध्यम वर्ग में काफ़ी भावुकतापूर्ण उद्गार सुनने को मिल रहे थे। मेरे परिचितों में भी और सोशल मीडिया के ज़रिए भी।