यहाँ-वहाँ भटकने से नहीं, लड़ने से बदलेंगे हालात
इन्द्रजीत, लुधियाना
मज़दूर साथियो, 1992 में मैं लुधियाना के एक पावरलूम कारखाने में काम करता था। लुधियाना आये मुझे ज़्यादा दिन नहीं हुए थे। उसी दौरान पावरलूम मज़दूरों की एक बहुत बड़ी हड़ताल हुई, जो लगभग पैंतालिस दिन चली थी। शहर के सारे पावरलूम मज़दूर हड़ताल पर बैठे थे। हमें लगता था कि हड़ताल करके भूखे बैठने से क्या फ़ायदा, चलो, किसी दूसरे शहर में जाकर काम कर लेंगे – भारत तो बहुत बड़ा देश है, कहीं भी काम किया जा सकता है। तो मैं यहाँ से महाराष्ट्र चला गया। वहाँ पर थाने जिले में भिवण्डी शहर है जहाँ पावरलूम का कारोबार होता है। वहाँ पर अपने गाँव-घर के लोग रहते थे। मेरे सामने पहली परेशानी रहने की थी क्योंकि जिस कमरे में गाँव वाले अन्य मज़दूर रहते थे उसमें पहले से ही आठ लोग रहते थे। मैने सोचा क्यों न एक कमरा किराए पर लिया जाये। मैं अपने गाँव वालों के साथ कमरा देखने गया। बड़ी मुश्किल से एक कमरा मिला जिसे लकड़ी के पटरों को कील से ठोंककर बनाया गया था। उसका फ़र्श भी कच्चा था। जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे थे। ऊपर से तीन हज़ार रुपये सिक्योरिटी और तीन सौ रुपया किराया। मैं वहाँ नया था। तीन हज़ार रुपये कहाँ से लाता। अगर बात सिर्फ़ किराए की ही होती, तो कोई इन्तज़ाम हो जाता। तब मुझे लगा कि मैं आसमान से गिरकर खजूर पर अटक गया हूँ। लुधियाना में तो एक महीने का एडवांस किराया देने पर कमरा मिल जाता है, लेकिन यहाँ पर पहले ग्यारह महीने का एडवांस किराया देना पड़ रहा था। मैंने कमरे का ख़याल दिल से निकाल दिया। एक तो कमरा भी ठीक नहीं था। दूसरे, मेरे पास इतनी रक़म भी नहीं थी। दिन इसी दौड़-धूप में गुज़र गया। शाम हुई तो गाँव वाले साथियों ने खाना खिला दिया। खाना भिस्ती में खाना था। सारे मज़दूर भिस्ती में ही खाते थे जहाँ एक कमरे में सौ-सौ लोगों को खिलाया जाता था। अगर कोई मेहमान आ जाये तो एक-दो टाइम खाना खाने का पैसा नहीं लगता था। खाने के बाद सोने के लिए मुझे दूसरे मोहल्ले में जाना पड़ा। शान्ति नगर नाम का यह मोहल्ला एक पहाड़ी पर बसा है। पहाड़ी की चढ़ाई चढ़ते हुए मेरा दम फूल गया। वहाँ मज़दूरों के हज़ारों कमरे हैं जिनका रोज़ इसी पहाड़ी पर चढ़ना-उतरना होता है। वहाँ सारे कमरे लकड़ी के पटरों के और कच्चे फ़र्श वाले थे। उसी पहाड़ी पर एक कमरे में मैंने रात गुज़ारी। सुबह दस लीटर वाला गैलन लेकर नीचे से पानी लाना पड़ता था। मैं भी किसी तरह हाँफते-काँपते एक गैलन पानी लेकर आया। उसी में नहाओ, उसी में धोओ। कितनी परेशानी झेलनी पड़ती है हम मज़दूरों को। साथियो, उस दस लीटर पानी से नहाने पर मेरे शरीर का साबुन भी नहीं छूटा। किसी तरह आधा-अधूरा नहाकर मैं सुबह अपने गाँव वाले मज़दूर साथियों के पास गया। साथियों ने मुझे एक कारख़ाने में काम पर लगवा दिया। वहाँ अन्दर ही बावड़ी थी। नहाने-धोने की सुविधा तो थी, मगर पीने का पानी नहीं था। अगर रात के समय किसी को प्यास लग जाये तो सुबह चार बजे होटल खुलने तक प्यासा ही रहना पड़ता था। कारख़ाने की नीचे की मंज़िल में काम होता था। ऊपर एक हॉल था वहीं पर सो जाता था। छुट्टी सिर्फ़ शुक्रवार को दस बजे से पाँच बजे तक होती थी। मैने बड़ी परेशानी से एक साल गुज़ारा। मैं फिर से लुधियाना आकर काम करने लगा। मैंने महाराष्ट्र जाकर सीखा कि हमें यहाँ-वहाँ भागकर अच्छे काम की तलाश करने के बजाय वहीं लड़ना होगा जहाँ हम काम करते हैं। भागने से हमारी समस्या हल नहीं होगी। सारे देश में ही सभी मज़दूरों की समस्या तो एक जैसी ही है। कहीं कुछ कम बुरी है तो कहीं कुछ ज़्यादा। अगर हमारी समस्याएँ साझी हैं तो निदान भी साझा ही होगा।
मज़दूर बिगुल, मार्च 2011













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