Category Archives: आपदाएँ

पूँजीवादी खेती, अकाल और किसानों की आत्महत्याएँ

देश में सूखे और किसान आत्महत्या की समस्या कोई नयी नहीं है। अगर केवल पिछले 20 सालों की ही बात की जाये तो हर वर्ष 12,000 से लेकर 20,000 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। महाराष्ट्र में यह समस्या सबसे अधिक है और कुल आत्महत्याओं में से लगभग 45 प्रतिशत आत्महत्याएँ अकेले महाराष्ट्र में ही होती हैं। महाराष्ट्र में भी सबसे अधिक ये विदर्भ और मराठवाड़ा में होती हैं।

भूकम्प से मची तबाही से पूँजीवाद पल्ला नहीं झाड़ सकता

जिन कोठरी-नुमा घरों में मेहनतकश आबादी को रहना पड़ता है, उन्हें बनाते समय किसी तरह के भूकम्प-निरोधक दिशानिर्देशों पर अमल नहीं किया जाता। यही वजह है कि भूकम्प या ऐसी ही किसी और आपदा के समय जान-माल का सबसे अधिक नुक़सान मेहनतकश आबादी का ही होता है। दूसरा, सभी बुनियादी सुविधाओं के कुछ ही शहरों तक सीमित रहने के चलते, ऐसी आपदाओं के समय देहात और दूर-दराज़ के लोगों के पास कोई आसरा नहीं होता, जिससे वे मदद की उम्मीद कर सकें। इसी असमान और अनियोजित विकास के कारण प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली तबाही कई गुणा बढ़ जाती है।

उत्तराखण्डः दैवी आपदा या प्रकृति का कोप नहीं यह पूँजीवाद की लायी हुई तबाही है!

पूँजीवादी विकास के मॉडल के तहत पर्यावरण की परवाह न करते हुए जिस तरह अंधाधुंध तरीक़े से सड़कें, सुरंगें व बाँध बनाने के लिए पहाड़ियों को बारूद से उड़ाई गईं, उसकी वजह से इस पूरे इलाक़े की चट्टानों की अस्थिरता और बढ़ने से भूस्ख़लन का ख़तरा बढ़ गया। वनों की अंधाधुंध कटाई और अवैध खनन से भी पिछले कुछ बरसों में हिमालय के इस क्षेत्र में भूस्खलन, मृदा क्षरण और बाढ़ की परिघटना में बढ़ोत्तरी देखने में आयी है। यही नहीं इस पूरे इलाक़े में पिछले कुछ वर्षों में हिमालय की नदियों पर जो बाँध बनाये गये या जिन बाँधों की मंजूरी मिल चुकी है उनसे भी बाढ़ की संभावना बढ़ गई है