बरगदवा (गोरखपुर) के मज़दूरों को अतीत के संघर्षों के सकारात्मक व नकारात्मक पहलुओं से सीखते हुए नये संघर्षों की नींव रखनी होगी
प्रसेन
गोरखपुर के बरगदवा में स्थित ‘ऋषिक स्पिनिंग प्राइवेट लिमिटेड’ (जिसका पहले नाम वी.एन.डायर्स था) के मालिक ने मज़दूरों की मेहनत की लूट मचाने में सारे नियमों को ताक़ पर रख दिया है। बरगदवा के ज़्यादातर कारख़ानों में मज़दूरों की स्थिति लगभग एक जैसी ही है। लेकिन इस कारख़ाने के मालिक ने मज़दूरों के मेहनत की लूट की चक्की को सभी सरकारी छुट्टियों के दिन भी चलाना शुरू कर दिया है। ग़ौरतलब है कि इससे पहले मकर संक्रान्ति, 26 जनवरी के दिन मज़दूरों को छुट्टी मिलती थी। लेकिन अब ऐसी सारी छुट्टियाँ ख़त्म कर दी गई हैं। 26 जनवरी के दिन जब मालिक और नेता अलग-अलग जगहों पर गणतन्त्र दिवस का क़सीदा पढ़ रहे थे तो इस कारख़ाने के मज़दूर मालिकों के मुनाफ़े के लिए मशीनों में पेरे जा रहे थे।
इस धागा कारख़ाने में लगभग 350 मज़दूर काम करते हैं। इधर कारख़ाने के मालिक ने पुराने मज़दूरों को निकाल कर नए मज़दूर और क़रीब 120 स्त्री मज़दूरों को काम पर लगाया है। कारख़ाने में 3 तरह के मज़दूर हैं – ट्रेनी मज़दूर, सीनियर ट्रेनी मज़दूर और कारीगर। ज़्यादातर ट्रेनी और सीनियर ट्रेनी मज़दूर हैं। ट्रेनी मज़दूरों को 325 रुपये, सीनियर ट्रेनी मज़दूरों को 335 रुपये और कारीगरों को 453 रुपये दैनिक मज़दूरी मिलती है। असल में मज़दूरों को ट्रेनिंग के नाम पर लम्बे समय तक कम मज़दूरी पर काम करवाया जाता है। मज़दूरों ने बताया काम सीखने में मुश्किल से तीन महीने लगते हैं, लेकिन मालिक ट्रेनिंग के नाम पर 1 से डेढ़ साल तक काम करवाता है। उसके बाद कारीगर का दर्ज़ा दिया जाता है, अगर तब तक मज़दूर टिका रहा या मालिक द्वारा निकाल न दिया गया। यहाँ कोई भी मज़दूर परमानेण्ट नहीं है। किसी मजबूरीवश एक या दो दिन की अनुपस्थिति होने पर मज़दूरों के लिए गेट बन्द कर दिया जाता है। ओवरटाइम का डबल रेट से भुगतान नहीं होता। बस 4 घण्टे ओवरटाइम करने वाले को खुराकी के लिए 37 रुपये और 8 घण्टे ओवरटाइम करने वाले को खुराकी के लिए 75 रुपये मिलता है। मज़दूरों ने बताया कि कैशियर सन्तोष गुप्ता द्वारा अक्सर हाजिरी में गड़बड़ी कर दी जाती है। मज़दूर उसे ठीक करवाने के लिए कई दिन चक्कर लगाते हैं और कई बार उतना पैसा नहीं मिलता है। स्त्री मज़दूरों के साथ यह घटनाएँ अधिक होती हैं। 120 स्त्री मज़दूरों के लिए मात्र एक टूटा—फूटा टॉयलेट है। मास्क आदि की दूर-दूर तक कोई व्यवस्था नहीं है।
इस पूरे इलाक़े में बिगुल मज़दूर दस्ता के नेतृत्व में एक जुझारू लड़ाई लड़ी गई थी। काफ़ी संघर्षों के बाद मालिकों को मज़दूरों की एकजुटता के कारण उनके क़ानूनी अधिकारों की माँग माननी पड़ी थी। लेकिन मज़दूरों की राजनीतिक चेतना जिस हिसाब से विकसित होनी चाहिए थी वह नहीं की जा सकी। नेतृत्व ने आगे चलकर इस कमी का समाहार किया और इस दिशा में काम किया जा रहा है। उस समय मज़दूर क़ानूनी अधिकारों को पाकर तसल्ली से बैठ गए। जबकि मालिकों ने लगातार उन हक़ों को दुबारा छीनने के लिए तरह-तरह की तिकड़म करते रहे। मज़दूर राजनीतिक चेतना की कमी के चलते न तो अपने दूरगामी हितों को देख सके न ही जो लड़कर हासिल किये थे वे उसे बचा पाये। आज स्थिति यह है कि मालिक पूरी तरह से मज़दूरों पर हावी हैं। इस स्थिति को तभी पलटा जा सकता है, जब नये सिरे से राजनीतिक प्रचार और संगठन के काम को खड़ा किया जाय। इस दिशा में मज़दूरों के अगुवा दस्ते ने एक शुरुआत की है, जिसके नतीजे, हम उम्मीद कर सकते हैं, आने वाले समय में दिखायी देंगे।
मज़दूरों में इन सबके प्रति काफ़ी असन्तोष है। लेकिन यहाँ पर एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ने में कई समस्याएँ हैं। सबसे पहले मज़दूरों में एकजुटता का बहुत अभाव है। मालिक ने स्त्री-मज़दूरों को आम तौर पर सुबह और दोपहर की पाली में रखा है। पुरुष मज़दूर अगर कारख़ाना बन्द भी करना चाहें तो पहली दो पाली में कारख़ाना नहीं बन्द होता। क्योंकि एक तो मालिकों ने स्त्री मज़दूरों को बहुत डराकर रखा है। दूसरे, महिला मज़दूरों की यह सोच काम करती है कि चुपचाप काम कर लो नहीं तो यह भी नहीं मिलेगा। इस वजह से कारख़ाना बन्द नहीं हो पाता। पुरुष मज़दूर अपना गुस्सा स्त्री मज़दूरों पर निकालते हैं कि इन सबकी वजह से सब हो रहा है। जबकि मज़दूरों को यह समझना होगा कि स्त्री मज़दूरों को उनके हक़-अधिकार की बात समझानी पड़ेगी, उन्हें एकजुट करना होगा और मालिकों की चाल विफल करनी होगी। पुरुष मज़दूरों को समझना होगा कि पूँजीवाद स्त्रियों की सामाजिक असुरक्षा का इस्तेमाल उन्हें दबाकर रखने में करता है ताकि उनके श्रम को और भी बेरहमी से निचोड़ा जा सके। लेकिन अगर वे लड़ने के लिए खड़ी हो जाती हैं, तो उनका कोई दुश्मन मुकाबला भी नहीं कर पाता। इसलिए धैर्य से समूची मज़दूर आबादी को साथ लाने और उनकी राजनीतिक चेतना व संगठन को खड़ा करने का काम करके ही हम आगे बढ़ सकते हैं, आपस में एक-दूसरे पर गुस्सा या खीझ प्रकट करके नहीं।
एकजुटता और यूनियन के अभाव में मज़दूरों में काम छूटने का डर बना रहता है। वास्तव में, फ़ासीवादी मोदी सरकार के आने के बाद से खाने-पीने आदि चीज़ों के रेट जिस रफ़्तार से बढ़े हैं उसमें मज़दूरों को अपने परिवार सहित गुजारा करना बहुत मुश्किल हो गया है। इसलिए भी कई मज़दूर चाहते हुए भी जोखिम लेने से डरते हैं। लेकिन इस डर से मज़दूरों को मुक्त होकर मालिक की अँधेरगर्दी के ख़िलाफ़ एकजुट होना होगा। क्योंकि वैसे भी मज़दूरों पर छँटनी की तलवार लटकती ही रहती है।
तीसरे, मज़दूरों को यह बात समझनी होगी कि पूँजीपतियों ने फ़ासीवादी मोदी सरकार को सत्ता में यूँ ही नहीं बिठाया है। आज मालिकों के मुनाफ़े की औसत दर संकट का शिकार है। इसलिए मोदी सरकार न केवल सारे श्रम क़ानूनों को मालिकों में पक्ष में ख़त्म करती जा रही है, बल्कि चार लेबर कोड के ज़रिये मज़दूरों की मेहनत को और भी ज़्यादा निचोड़ने का रास्ता बना रही है। श्रम विभाग आदि का पहले भी तभी कोई मतलब था जब मज़दूर संगठित होकर आवाज़ उठाते थे। लेकिन अब श्रम विभाग को ही ख़त्म किया जा रहा है। मई दिवस के शहीदों की कुर्बानी से हासिल 8 घण्टे के क़ानूनी अधिकार को ख़त्म करके 12 घण्टे तक बढ़ाने की योजना मोदी सरकार द्वारा बनाई जा रही है। एलएनटी के चेयरमैन सुब्रह्मण्यम जैसे पूँजी के टुकड़खोर ने हाल में ही यह बयान दिया कि वह सप्ताह में 90 घण्टे यानी हर दिन 13 घण्टे और वह भी सातों दिन काम लेना चाहता है। मज़दूरों को यह बात यूँ ही नहीं लेनी चाहिए।
इसलिए मज़दूरों के अपने हक़-अधिकार को बचाने और उन्हें बढ़ाने का केवल एक रास्ता है – मज़दूरों की व्यापक जुझारू एकता, राजनीतिक चेतना और संगठन। बरगदवा के इलाक़े के मज़दूर इलाक़ाई और पेशा आधारित यूनियन का निर्माण किये बग़ैर मालिकों का मुक़ाबला नहीं कर सकते। मज़दूरों को यह समझना होगा कि संघर्षों से जो हासिल हो उस पर अपनी पकड़ मज़बूत रखते हुए, अन्य अधिकारों के लिए संघर्ष की निरन्तरता बनाये रखनी होगी। मज़दूरों को नियमित पाक्षिक या मासिक बैठक, मज़दूर अखबार का अध्ययन, देश-दुनिया में लड़ रहे मज़दूरों के संघर्षों और उनके तौर-तरीक़ों को जानना-सीखना होगा। मज़दूरों के शोषण पर टिकी व्यवस्था की सच्चाई जाननी होगी। वैचारिक तौर पर अपने को तैयार किये बग़ैर मज़दूर वर्ग अपने संगठन को न तो मज़बूत कर सकता है और न ही व्यापक बना सकता है और न ही मालिकों और उसकी सरकार के मज़दूर विरोधी नीतियों को पहले से समझकर अपनी अग्रिम तैयारी कर सकता है।
मज़दूर बिगुल, फरवरी 2025
‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्यता लें!
वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये
पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये
आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये
आर्थिक सहयोग भी करें!
बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।
मज़दूरों के महान नेता लेनिन