आपस की बात
हम सब मेहनतकश आदमखोर पूँजीपतियों की लूट का शिकार हैं।
सभी बिगुल पाठकों को मेरा क्रान्तिकारी अभिनन्दन,
साथियो, मेरा नाम रमन है, मैं हरियाणा के कैथल जि़ले के चैशाला गाँव का निवासी हूँ। मेरा जन्म एक मज़दूर परिवार में हुआ। और मैंने अपने परिवार की गाढ़ी कमाई के सहारे डिप्लोमा किया। इसके बाद गुुड़गाँव, रेवाड़ी, बद्दी, डेराबस्सी, पानी आदि स्थानों पर नौकरी के लिए आवेदन दिया, लेकिन कहीं भी सिफ़ारिश या जान-पहचान न होने के कारण मेरे आवेदनों का कोई जवाब नहीं आया। उसके बाद मैनें दो साल एसएससी-एचएसएससी की कोचिंग शुरू कर दी। लम्बी तैयारी के बाद कोचिंग की धन्धेबाज़ी और सरकारी नौकरियों की बेहद कमी के कारण मैं हताश हो गया। और उसके बाद मैं कैथल की चावल मिल में मज़दूर के रूप में काम करने लगा। वहाँ मुझे 12 घण्टे के 7500 रुपये मिलते थे। इसके अलावा न कोई छुट्टी और न ही कम्पनी की तरफ़ से कोई चाय या फिर लंच के टाइम-सीमा तय नहीं थी। मुझे वहाँ चावल पोलिश की बोरिया मशीन से हटाकर 25-30 फ़ीट की दूरी पर उठाकर ले जानी थी। जिसके लिए बिल कार्ट होनी चाहिए। मुनाफ़ाखोर मालिक इसकी माँग करने पर काम से निकालने की धमकी देता है। साथ ही धूल और कचरे से बचने के लिए हमें न कोई मास्क नहीं दिया जाता और न ही दस्ताने। काम के दौरान आलम ये था कि मज़दूर बाथरूम या फिर किसी और काम से 5-10 मिनट भी कहीं नहीं जा सकता है। यहाँ काम करने वाले पलेदार सुबह 8 बजे से रात को 10-12 बजे तक हज़ारों बोरियाँ ढोते हैं, मगर उनको हर रोज़ सिर्फ़ 300-350 रुपये ही 14-16 घण्टे काम करने पर मिलते है और सभी काम यहाँ ठेके पर लिया जाता है। ठेकेदार का मज़दूरों के प्रति बहुत बुरा व्यवहार है। कई बार तो थक चुका मज़दूर जब काम न कर पर रहा हो, तो उसकी पिटाई तक कर दी जाती है। यहाँ हर आदमी जो काम करता है एक पशु जैसी जि़न्दगी जी रहा है। दूसरी ओर मालिक हमारी मेहनत पर आदमखोर जोक की तरह अपनी निजी सम्पत्ति बढ़ाने में लगा हुआ है। फै़क्टरी में अन्य राज्यों के मज़दूर भी हैं। इसलिए ठेकेदार मज़दूरों को धर्म-जाित के नाम पर बाँटने की चालें चलता रहता है। साथियो, पहले मैें बिगुल अख़बार में मज़दूरों के हालातों की ख़बरें पढ़ता था, लेकिन मैं भी देख रहा हूँ कि हम सब मेहनतकश आदमखोर पूँजीपतियों की लूट का शिकार हैं। ऐसे में मज़दूरों को संगठित होकर आठ घण्टे काम, रविवार की छुट्टी, ओवरटाइम का डबल रेट, कैण्टीन का खाना और दुघर्टना होने पर उचित मुआवज़ा, सुरक्षा उपकरण आदि की माँग करनी होगी। ताकि हम भी एक सम्मानजनक जि़न्दगी जी सके।
साथियो, मैं ‘मज़दूर बिगुल’ पिछले एक साल से पढ़ रहा हूँ, जिसके ज़रिये मैंने मज़दूर के हक़-अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संगठित होकर जुझारू आन्दोलन करने की ज़रूरत को समझा और जाना है।
रमन,
कैथल, चैशाला गाँव
मज़दूर बिगुल, मई 201













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