ज्योतिराव फुले – स्त्री मुक्ति के पक्षधर व जाति उन्मूलन आन्दोलन के योद्धा
11 अप्रैल 2017 को ज्योतिराव फुले की 190वीं जयन्ती मनाई गयी। लगभग 169 वर्ष पहले फुले ने बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय खोलने का निर्णय लिया था। विधवा विवाह का समर्थन, विधवाओं के बाल कटने से रोकने के लिए नाइयों की हड़ताल, बाल विवाह का निषेध, विधवाओं के बच्चों का पालन-पोषण ऐसे अनेक क़दमों से ज्योतिराव-सावित्रीबाई का स्त्री समानता, स्त्री स्वतन्त्रता का दृष्टिकोण उद्घाटित होता है। स्त्री मुक्ति व जाति उन्मूलन के संघर्ष में फुले का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है। आज हम सब जानते हैं कि स्त्री मुक्ति व जाति उन्मूलन आपस में गुँथे हुए हैं। जाति उन्मूलन के लिए अन्तरजातीय विवाह होने ज़रूरी हैं और वो तभी हो सकते हैं जब स्त्री मुक्त होगी। साथ ही स्त्री भी सच्चे मायनों में तभी स्वतन्त्र हो सकेगी जब जाति ख़त्म होगी।
सामाजिक परिर्वतन के लिए ज्योतिराव फुले सरकार की बाट नहीं जोहते रहे। उपलब्ध साधनों से उन्होंने अपने संघर्ष की शुरुआत की। सामाजिक सवालों पर भी फुले शेटजी (व्यापारी) व भटजी (पुजारी) दोनों को दुश्मन के रूप में चिह्नित करते थे। जीवन के उत्तरार्ध में वे ब्रिटिश शासन व भारतीय ब्राह्मणवादियों के गँठजोड़ को समझने लगे थे। इसीलिए उन्होंने कहा था कि अंग्रेज़़ी सत्ता में अधिकांश अधिकारी ब्राह्मण हैं और जो अधिकारी अंग्रेज़़ हैं उनकी हड्डी भी ब्राह्मण की ही है।
आज जब संघी फासीवादी जातिप्रथा व पितृसत्ता के आधार पर व साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से दलितों, स्त्रियों व अल्पसंख्यकों पर हमले तीव्र कर रहे हैं, खाने-पीने-जीवनसाथी चुनने व प्रेम के अधिकार को भी छीनने की कोशिश कर रहे हैं, तब फुले को याद करने का विशेष औचित्य है। ब्राह्मणवाद व पूँजीवाद विरोधी संघर्ष तेज़ करके ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है व उनके सपनों का समाज बनाया जा सकता है।
मज़दूर बिगुल, अप्रैल 2017













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