धुएँ में उड़ता बचपन
कुमार श्याम, बरमसर, हनुमानगढ़, राजस्थान
मेरा गाँव राजस्थान के हनुमानगढ़ जि़ले में स्थित है। गाँव की ज़मीन व गाँव की रोही में उपलब्ध जिप्सम की प्रचुर मात्रा की वजह से क्षेत्र में चर्चित है। आरम्भ में जिप्सम आर्थिक दृष्टि से इस गाँव की अहम कड़ी था। दरअसल जिप्सम के खनन तथा उसको ट्रकों व ट्रालियों में लोडिंग करने के रूप में गाँव के समूचे मज़दूर वर्ग का एकमात्र रोज़गार था। जिप्सम की खनन-प्रक्रिया एवं फिर उसकी वाहनों में लोडिंग करना एक ज़ोखिमपूर्ण तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तो था ही, साथ में एक ग़ैर-क़ानूनी कार्य भी था। कई मर्तबा जिप्सम खनन के समय पुलिस के मौक़े पर पहुँच जाने के बाद तमाम साधनों को ज़ब्त कर सम्बन्धित व्यक्तियों पर कार्रवाई की जाती थी। गाँव में जिप्सम खनन के दौरान खान के ढह जाने के परिणामस्वरूप कुछ दुर्घटनाएँ भी घटी हैं, जिनमें कई मज़दूरों की जानें गयी हैं। लेकिन खेती की निराशाजनक हालत के बाद घोर बेरोज़गारी के कारण यह सब करना गाँव के मज़दूर वर्ग की विवशता थी। बाद में अत्याधुनिक मशीनरी के प्रचलन के बाद जिप्सम खनन एवं लोडिंग की प्रक्रिया जेसीबी सरीखी मशीनों से अंज़ाम दी जाने लगी। जिसका परिणाम यह हुआ कि गाँव के हर मज़दूर का रोज़गार छिन गया।
जिप्सम की पर्याप्त उपलब्धता देखते हुए शहरों व महानगरों में बैठे धनासेठों ने गाँव के आस-पास ही चूना-फ़ैक्टरियाँ स्थापित करना शुरू कर दिया। यह प्रक्रिया इतनी तीव्र गति से हुई कि गाँव के दोनों तरफ़ हाइवे के किनारे-किनारे इन फ़ैक्टरियों का अम्बार लग गया। जिनकी संख्या दिन-ब-दिन बढ़ ही रही है। बरमसर गाँव पूँजीपतियों का आकर्षण-केन्द्र बन गया। ऐसी स्थिति में गाँव के मज़दूर वर्ग के रोज़गार का एकमात्र विकल्प ये फ़ैक्टरियाँ ही रह गयीं, फलत: समूचा मज़दूर वर्ग इन चूना-फ़ैक्टरियों में भर्ती हो गया। इन मज़दूरों के अलावा बिहार से मज़दूरों का आगमन भी शुरू हो गया। वर्तमान में अधिकांश बिहारी मज़दूर यहाँ पर काम करते हैं। विकसित अत्याधुनिक तकनीकों तथा दिन-रात मज़दूरों के बेतहाशा शारीरिक शोषण के बीच धन्नासेठ रोज़ाना बेहिसाब उत्पादन करते हैं। लेकिन इन फ़ैक्टरियों के स्थापित होने के बाद इनकी चिमनियों से निकलने वाले ज़हरीले धुएँ की वजह से वातावरण की निरन्तर क्षति के साथ गाँव की रोही की उत्पादन क्षमता में भी भारी गिरावट आयी है। इन फ़ैक्टरियों में काम करने वाले मज़दूरों के श्वसन सम्बन्धी रोग होने की पर्याप्त सम्भावना रहती है क्योंकि चूना फेफड़ों व अंगों के लिए बेहद हानिकारक होता है।
इन सबसे भी भयानक स्थिति तब दृष्टिगत होती है जब इन फ़ैक्टरियों में गाँव के स्कूली बच्चों को काम करते हुए देखा जाता है। निम्न वर्ग तथा मध्यमवर्गीय परिवारों में आर्थिक समस्याएँ होना आम बात है, इसी के चलते उन परिवारों के बच्चे सहज-सुलभ कार्य हेतु इन फ़ैक्टरियों का रुख़ करते हैं। उसके बाद इन बच्चों को लगे दिहाड़ी के चस्के को ये लोग बड़े शातिराना व सुनियोजित तरीक़े से इस्तेमाल करते हैं जिससे ये बच्चे उस मीठे प्रलोभन से बाहर नहीं निकल पाते। इस तरह अशिक्षित एवं ग़ैरजि़म्मेदार परिजनों की सहमति से लगभग बच्चों का भविष्य यूँ धुएँ में उड़ रहा है। जो सर्वाधिक चिन्तनीय एवं विचारणीय पहलू है। जिप्सम के अन्धाधुन्ध खनन के परिणामस्वरूप जिप्सम की उपलब्धता अब आंशिक ही रह गयी है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया प्रशासन की नाक के नीचे घटित होती है। चूने में पिसता बचपन हाथ पर हाथ धरे सब लोग इत्मिनान से देख रहे हैं।
मज़दूर बिगुल, अप्रैल 2017













Recent Comments