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कात्यायनी की दो कविताएँ

नहीं पराजित कर सके जिस तरह
मानवता की अमर-अजेय आत्मा को,
उसी तरह नहीं पराजित कर सके वे
हमारी अजेय आत्मा को
आज भी वह संघर्षरत है
नित-निरन्तर
उनके साथ
जिनके पास खोने को सिर्फ़ ज़ंजीरें ही हैं
बिल्कुल हमारी ही तरह!

माओ त्से-तुङ की दो कविताएँ

माओ ने यह सुप्रसिद्ध कविता उस समय लिखी थी जब चीन में पार्टी के भीतर मौजूद पूंजीवादी पथगामियों (दक्षिणपंथियों को यह संज्ञा उसी समय दी गई थी) के विरुद्ध एक प्रचण्ड क्रान्ति के विस्फोट की पूर्वपीठिका तैयार हो रही थी। महान समाजवादी शिक्षा आन्दोलन के रूप में संघर्ष स्पष्ट हो चुका था। युद्ध की रेखा खिंच गई थी। यह 1966 में शुरू हुई महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की पूर्वबेला थी जिसने पूंजीवादी पथगामियों के बुर्जुआ हेडक्वार्टरों पर खुले हमले का ऐलान किया था। सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति ने पहली बार सर्वहारा अधिनायकत्व के अन्तर्गत सतत क्रान्ति और अधिरचना में क्रान्ति का सिद्धान्त प्रस्तुत किया और इसे पूंजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने का एकमात्र उपाय बताते हुए समाजवाद संक्रमण की दीर्घावधि के लिए एक आम कार्यदिशा दी। इसके सैद्धान्तिक सूत्रीकरणों की प्रस्तृति 1964.65 में ही की जाने लगी थी।

त्रिलोचन की कविताएँ

पथ पर
चलते रहो निरन्तर
सूनापन हो
या निर्जन हो
पथ पुकारता है।
गत स्वप्न हो
पथिक
चरण-ध्वनि से
दो उत्तर
पथ पर
चलते रहो निरन्तर

गीत – रोटी और गुलाब का संघर्ष

यह एक सामूहिक गीत है जिसे 1912 में संयुक्त राज्य अमेरिका की तेईस हजार महिला मजदूरों ने गाया था। ये पच्चीस अलग-अलग राष्ट्रीयताओं की तथा पैंतालीस अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाली थीं। इन महिलाओं ने तेजी से बढ़ते हुए वस्त्र उद्योग को तीन महीनों तक (जनवरी–मार्च 1912) एकदम ठप्प कर दिया था। इससे पहले इतिहास में कभी इतनी संख्या में विभिन्न जगहों की महिलाएँ जीवन-निर्वाह से थोड़ी ज्यादा मजदूरी तथा बेहतर जिन्दगी के अधिकार की मांग को लेकर संयुक्त और इतने प्रभावी रूप से किसी हड़ताल में शामिल नहीं हुई थीं।

कविता – भगतसिंह, इस बार न लेना काया भारतवासी की / शंकर शैलेन्‍द्र

भगतसिंह, इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी, सज़ा मिलेगी फांसी की.

कविता – बीज तुम बोते हो, काटते हैं दूसरे ही… / पर्सी बिषी शेली

क्यों तुम भू–स्वामियों के हेतु
भूमि जोतते हो,
दे रहे जो नीची से नीची स्थिति तुम्हें?
क्यों तुम उन स्वामियों के हेतु
बुन रहे हो यह
नूतन आकर्षक वस्त्र्
पटुता से, अथक परिश्रम से;
जिससे उन वस्त्रों को, जो कि बहुमूल्य हैं,
क्रूर वे शासक–गण गौरव से पहनें?

कविता : एक पढ़ सकने वाले कामगार के सवाल / बर्तोल्त ब्रेख्त Poem : Questions From a Worker Who Reads / Bertolt Brecht

किसने बनाया सात द्वारों वाला थीब?
किताबों में लिखे हैं सम्राटों के नाम।
क्‍या सम्राट पत्‍थर ढो-ढोकर लाये?

कविता – कौन तोड़ेगा तेरी बेड़ि‍यां / बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट

क्‍या तनहाई बदल सकती है
तेरी तस्‍वीर?
या तो बन्‍दूक तेरे वास्‍ते
या फिर जंजीर!

कविता – मैं कभी पीछे नहीं लौटूँगी / मीना किश्‍वर कमाल Poem – I will never return / Meena Keshwar Kamal

अब मुझे कमजोर और नाकारा न समझना
अपनी पूरी ताकत के साथ मैं तुम्‍हारे साथ हूँ
अपनी धरती की आजादी की राह पर
मेरी आवाज घुलमिल गयी है हजारों जाग उठी औरतों के साथ

कविता – जो पैदा होंगी हमारे बाद / अज्ञात

ये मत कहो बहनो कि तुम कुछ नहीं कर सकतीं
आस्था की कमी अब और नहीं
हिचक अब और नहीं
आओ, पूछें अपने आप से
क्या चाहते हैं हम?