Tag Archives: कवितायें / गीत

त्रिलोचन की कविताएँ

पथ पर
चलते रहो निरन्तर
सूनापन हो
या निर्जन हो
पथ पुकारता है।
गत स्वप्न हो
पथिक
चरण-ध्वनि से
दो उत्तर
पथ पर
चलते रहो निरन्तर

गीत – रोटी और गुलाब का संघर्ष

यह एक सामूहिक गीत है जिसे 1912 में संयुक्त राज्य अमेरिका की तेईस हजार महिला मजदूरों ने गाया था। ये पच्चीस अलग-अलग राष्ट्रीयताओं की तथा पैंतालीस अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाली थीं। इन महिलाओं ने तेजी से बढ़ते हुए वस्त्र उद्योग को तीन महीनों तक (जनवरी–मार्च 1912) एकदम ठप्प कर दिया था। इससे पहले इतिहास में कभी इतनी संख्या में विभिन्न जगहों की महिलाएँ जीवन-निर्वाह से थोड़ी ज्यादा मजदूरी तथा बेहतर जिन्दगी के अधिकार की मांग को लेकर संयुक्त और इतने प्रभावी रूप से किसी हड़ताल में शामिल नहीं हुई थीं।

कविता – भगतसिंह, इस बार न लेना काया भारतवासी की / शंकर शैलेन्‍द्र

भगतसिंह, इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी, सज़ा मिलेगी फांसी की.

कविता – बीज तुम बोते हो, काटते हैं दूसरे ही… / पर्सी बिषी शेली

क्यों तुम भू–स्वामियों के हेतु
भूमि जोतते हो,
दे रहे जो नीची से नीची स्थिति तुम्हें?
क्यों तुम उन स्वामियों के हेतु
बुन रहे हो यह
नूतन आकर्षक वस्त्र्
पटुता से, अथक परिश्रम से;
जिससे उन वस्त्रों को, जो कि बहुमूल्य हैं,
क्रूर वे शासक–गण गौरव से पहनें?

कविता : एक पढ़ सकने वाले कामगार के सवाल / बर्तोल्त ब्रेख्त Poem : Questions From a Worker Who Reads / Bertolt Brecht

किसने बनाया सात द्वारों वाला थीब?
किताबों में लिखे हैं सम्राटों के नाम।
क्‍या सम्राट पत्‍थर ढो-ढोकर लाये?

कविता – कौन तोड़ेगा तेरी बेड़ि‍यां / बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट

क्‍या तनहाई बदल सकती है
तेरी तस्‍वीर?
या तो बन्‍दूक तेरे वास्‍ते
या फिर जंजीर!

कविता – मैं कभी पीछे नहीं लौटूँगी / मीना किश्‍वर कमाल Poem – I will never return / Meena Keshwar Kamal

अब मुझे कमजोर और नाकारा न समझना
अपनी पूरी ताकत के साथ मैं तुम्‍हारे साथ हूँ
अपनी धरती की आजादी की राह पर
मेरी आवाज घुलमिल गयी है हजारों जाग उठी औरतों के साथ

कविता – जो पैदा होंगी हमारे बाद / अज्ञात

ये मत कहो बहनो कि तुम कुछ नहीं कर सकतीं
आस्था की कमी अब और नहीं
हिचक अब और नहीं
आओ, पूछें अपने आप से
क्या चाहते हैं हम?

कविता – मेरे क्रोध की लपटें / एक फिलिस्‍तीनी स्‍त्री

तुमने मुझे बाँधा है
जकड़ा है ज़ंजीरों में
पर लपटें मेरे क्रोध की
धधकती हैं, लपकती हैं।
नहीं कोई आग इतनी तीखी
क्योंकि मेरी पीड़ा के ईंधन से
ये जीती हैं, पनपती हैं।

कविता – शुरुआत की सुबह / शंकर गुहा नियोगी

सिर्फ वेदनाएं
दुख की गाथाएं
चलती रहेंगी अनंत काल तक
या
हम उठ खड़े होंगे
अंतिम क्षड़ों में?
अन्‍त नहीं होगा
जहां अन्‍त होना था,
वहीं शुरुआत की सुबह खिल उठेगी।