कर्नाटक और तेलंगाना में न्यूनतम वेतन वृद्धि : नाकाफ़ी और देरी से लागू की गयी बढ़ोत्तरी
यह वेतन वृद्धि भी कांग्रेस की सरकारों ने किसी भलमनसाहत से नहीं बल्कि इन राज्यों में सम्भावित मज़दूर आन्दोलन की लहर से घबराकर की है क्योंकि सतह के नीचे इन दोनों राज्यों में भी मज़दूरों का गुस्सा और उनकी नाराज़गी पनप रही थी। कर्नाटक में पूँजीपति इसका कड़ा विरोध करने में लगे हैं। उनके अनुसार मज़दूरी पर वे पहले ही बेहद अधिक “ख़र्चा” कर रहे हैं और इसे और बढ़ाना सरासर अन्याय है! जैसा कि हमने ऊपर बताया, यह कोरा झूठ है। असलियत यह है कि पूँजीपतियों द्वारा मज़दूरी पर होने वाला निवेश लगातार ही घटाया गया है और पूँजीपति इसे और भी कम कर देना चाहते हैं। पहली बात तो यह है कि पूँजीपति मज़दूरी पर “ख़र्च” नहीं बल्कि निवेश करते हैं, जो मज़दूरों के श्रम से पैदा मुनाफ़े के साथ उनके पास वापस आ जाता है। मालिक का मुनाफ़ा मज़दूर के शोषण के ज़रिये हासिल होता है। मज़दूरी और कुछ नहीं बल्कि एक मज़दूर की श्रमशक्ति की क़ीमत होती है और एक मज़दूर श्रमकाल के एक हिस्से से अपनी मज़दूरी के बराबर मूल्य पैदा करता है तो बाक़ी हिस्सा मालिक बेशी-मूल्य के रूप में हड़पता है। यही उसके मुनाफ़े का आधार होता है। मालिक हर-हमेशा कोशिश करता है कि मज़दूरी कम की जाये ताकि मुनाफ़ा और उसकी दर को बढ़ाया जा सके। मुनाफ़ा और मज़दूरी व्युत्क्रमानुपाती होते हैं। इसको गोल करके कर्नाटक के पूँजीपति कोर्ट में और मीडिया में नंगा झूठ बोल रहे हैं। उनके अनुसार, कर्नाटक सरकार द्वारा की गयी वेतन-बढ़ोत्तरी उनका दमन है और उनके धन्धा करने के संवैधानिक हक़ का हनन है! पूँजीवादी मानकों से इन सेठों-व्यापारियों का कहना सही भी है क्योंकि पूँजीवादी जनवाद का मर्म ही मज़दूरों के लिए यह है कि पूँजीपतियों को मज़दूरों का शोषण करने की आज़ादी मिले!






















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