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सूरत में साप्ताहिक छुट्टी, वेतन बढ़ोत्तरी और आठ घण्टे के काम की माँग को लेकर आन्दोलनरत हैं मज़दूर!

इन मज़दूरों से 15-18 हज़ार के मासिक वेतन पर जानवरों की तरह काम कराया जाता है। 12 घण्टे फ़ैक्टरी के भीतर काम करने के बाद 3-4 घण्टे घर आने-जाने में लग जाते हैं। इसके बाद न तो शरीर को आराम मिल पाता है और न पर्याप्त भोजन। बेहतर शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी दूर की कौड़ी हैं। फैक्टरी, कारखाने में श्रम कानून लागू नहीं होते हैं। टेक्सटाइल मज़दूरों का कहना है कि काम के पीक सीज़न के दौरान मालिक मन-मुताबिक काम करवाता है और मना करने वाले मज़दूरों को काम से निकाल दिया जाता है। मजबूरन लोगों को दिन-रात जानवरों की तरह खटना पड़ता है। ये हालात सिर्फ़ गुजरात के मज़दूरों के नहीं हैं। देशभर में कमोबेश यही हालात हैं और पिछले 12 सालों में मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी और नारकीय हुई है। श्रम क़ानूनों के ज़रिये जो थोड़े-बहुत अधिकार मज़दूर हासिल कर पाते थे उसे भी भाजपा सरकार ने छीनने का काम किया है।

”गुजरात मॉडल” का ख़ूनी चेहरा: सूरत का टेक्सटाइल उद्योग या मज़दूरों का क़त्लगाह!

रिपोर्ट के अनुसार ये आँकड़े सूरत के टेक्सटाइल कारखानों में पेशागत स्वास्थ्य और सुरक्षा के हालात की बेहद चिन्ताजनक तस्वीर पेश करते हैं। दुर्घटनाओं के कारणाों पर नज़र डालें तो 2012 और 2015 के बीच हुई 121 घातक दुर्घटनाओं में से 30 जलने के कारण हुईं जबकि 27 बिजली का करण्ट लगने से हुईं। 23 दुर्घटनाओं का कारण ‘’दो सतहों के बीच कुचलना’’ बताया गया है। कारखानों की भीतरी तस्वीर से वाकिफ़ कोई भी व्यक्ति इसका मतलब समझ सकता है। इसके अलावा बहुत सी मौतें दम घुटने, ऊँचाई से गिरने, आग और विस्फोट, मशीन में फँसने, गैस आदि कारणों से हुई हैं। ज़्यादातर दुर्घटनाएँ जानलेवा क्यों बन जाती हैं इसका कारण कारखानों की हालत से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट में दिये गये एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। सूरत के सूर्यपुर इंडस्ट्रियल एस्टेट में अश्विनी कुमार रोड पर एक पावरलूम यूनिट में 3 अक्टूबर 2015 को सुबह 11.45 बजे आग लगी।