नेपाल में आया भीषण सैलाब – यह आपदा प्राकृतिक नहीं, बल्कि पूँजीवाद-जनित है
अब पर्यावरण व पारिस्थितिक तंत्र का विनाश इस हद तक हो चुका है कि आज पूँजीवाद की चौहद्दी के भीतर महज़ कुछ हरित नीतियों के ज़रिये सतत या टिकाऊ विकास की सारी बातें बिल्कुल बेमानी हैं। ऐसे में पूँजीवाद के भीतर समाधान खोजने के बजाय हमें पूँजीवाद का ही विकल्प खड़ा करना होगा। एक नियोजित व मानवकेन्द्रित समाज में ही सामाजिक समता व समरसता के साथ ही साथ पारिस्थितिक सन्तुलन भी स्थापित किया जा सकता है। केवल एक नियोजित अर्थव्यवस्था में ही उत्पादन, वितरण, विद्युत उत्पादन, संचार व परिवहन से सम्बन्धित गतिविधियों को इस प्रकार संचालित किया जा सकता है कि वे पर्यावरण को तबाह न करें।















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