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कोरोना वायरस और भारत की बीमार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ

आज नोवल कोरोना वायरस (SARS CoV 2) ने पूरे विश्व में कहर बरपा रखा है। चीन के वुहान शहर में पहली बार सामने आया यह वायरस “कोरोना वायरस बीमारी 19” (COVID 19) नाम की बीमारी करता है। चीन से दक्षिण कोरिया, इटली समेत पूरे यूरोप और अमेरिका होता हुआ यह वायरस अब भारत में भी आ धमका है। पिछले साल 17 नवम्बर को इसका पहला केस सामने आया था। उसके बाद से अब तक पूरी दुनिया में 1 लाख 45 हज़ार से ज़्यादा केस सामने आ चुके हैं, जिनमें से 5000 से ज़्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी है। मरने वालों में ज़्यादातर लोग चीन के हैं और ज़्यादातर वे हैं जो या तो 60 साल से ज़्यादा आयु के थे या फिर जिनको कोई गम्भीर बीमारी जैसे डायबिटीज़, टीबी, हृदय रोग या श्वास रोग पहले से थे।

असम में आप्रवासन : मज़दूर वर्गीय दृष्टिकोण

नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएए) के ख़िलाफ़ देशभर में सबसे उग्र विरोध असम में हो रहा है। लेकिन ग़ौर करने वाली बात यह है कि असम में यह विरोध सीएए के साम्प्रदायिक व ग़ैरजनवादी स्वरूप की वजह से नहीं हो रहा है। यह विरोध इस आधार पर नहीं हो रहा है कि सीएए में मुस्लिमों को नहीं शामिल किया गया है, बल्कि इस आधार पर हो रहा है कि सीएए असम समझौते के ख़िलाफ़ जाता है जिसमें असम में 1971 के बाद आये सभी आप्रवासियों को खदेड़ने की बात कही गयी थी। इसलिए असम में चल रहे इन विरोध-प्रदर्शनों का अनालोचनात्मक महिमामण्डन करने की बजाय इसके पीछे की राजनीति और विचार को समझने की ज़रूरत है और उसके लिए हमें असम में आप्रवासन के इतिहास को समझना होगा।

हमारे आन्‍दोलन को संविधान-रक्षा के नारे और स्‍वत:स्‍फूर्ततावाद से आगे, बहुत आगे, जाने की ज़रूरत क्‍यों है?

1970 के दशक के बाद के प्रचण्‍ड जनान्‍दोलन के बाद नागरिकता संशोधन कानून, राष्‍ट्रीय नागरिकता रजिस्‍टर, व राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर के खिलाफ देश भर में खड़ा हुआ आन्‍दोलन सम्‍भवत: सबसे बड़ा आन्‍दोलन है। अगर अभी इस पहलू को छोड़ दें कि इन दोनों ही आन्‍दोलनों में क्रान्तिकारी नेतृत्‍व की समस्‍या का समाधान नहीं हो सका था, तो भी यह स्‍पष्‍ट है कि क्रान्तिकारी राजनीतिक नेतृत्‍व के उभरने की सूरत में इन आन्‍दोलन में ज़बर्दस्‍त क्रान्तिकारी जनवादी और प्रगतिशील सम्‍भावनासम्‍पन्‍नता होगी। 1970 के दशक के आन्‍दोलन में एक सशक्‍त क्रान्तिकारी धारा के मौजूद होने के बावजूद, क्रान्तिकारी शक्तियां ग़लत कार्यक्रम, रणनीति और आम रणकौशल के कारण आन्‍दोलन के नेतृत्‍व को अपने हाथों में नहीं ले सकीं थीं और नेतृत्‍व और पहलकदमी जयप्रकाश नारायण के हाथों में चली गयी, जिसने इस जनउभार में अभिव्‍यक्‍त हो रहे क्रान्तिकारी गुस्‍से और जनअसन्‍तोष को मौजूदा व्‍यवस्‍था के दायरे के भीतर ही सीमित कर दिया, हालांकि काफी आमूलगामी जुमलों का शोर पैदा करते हुए। यानी वही काम जो प्रेशर कुकर में सेफ्टी वॉल्‍व करता है।

बच्चों को ज़हरीले प्रचार के नशे में पागल हत्यारे बनाने का संघी प्रोजेक्ट

फ़ासिस्ट प्रचार की ज़हरीली ख़ुराक पर लम्बे समय तक पलकर तैयार हुए दो पगलाये हुए नौजवानों ने दिल्‍ली में शान्ति से प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियाँ चलायीं। जगह-जगह ऐसे ही नफ़रत से पागल नौजवानों की भीड़ इकट्ठा करके “गोली मारो सालों को” के नारे लगवाये जा रहे हैं। पुलिस चुपचाप तमाशा देख रही है और फिर उन हमलावरों को बेशर्मी के साथ बचाने में जुट जा रही है।

संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ने के साथ-साथ संविधान के बारे में कुछ अहम सवाल

आज फ़ासिस्ट इस देश के संविधान को भी व्यवहारतः ताक पर रखकर हमारे अतिसीमित, रहे-सहे जनवादी अधिकारों पर भी डाका डाल रहे हैं और देश में लाखों-लाख लोग इन संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए सड़कों पर उतर कर लड़ रहे हैं। ऐसे में तय ही है कि हम उन अधिकारों के लिए अवाम के साथ मिलकर लड़ेंगे और फ़ासिस्टों को बेनक़ाब करने के लिए संविधान का हवाला भी देंगे, लेकिन इस प्रक्रिया में संविधान को जनवाद की “पवित्र पुस्तक” या “होली बाइबिल” कत्तई नहीं बनाया जाना चाहिए, इसका आदर्शीकरण या महिमामण्डन करना एक भयंकर अनैतिहासिक और आत्मघाती ग़लती होगी।

सरकार की धोखेबाज़ी से सावधान! एनपीआर ही एनआरसी है!

पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के विरोध में चल रहे तूफ़ानी आन्दोलन के कारण, मोदी-शाह की जोड़ी और सरकार में खलबली मची हुई है। सत्ताधारी लोग गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं। गृहमन्त्राी अमित शाह ने बार-बार कहा, ‘आप क्रोनोलॉजी समझिये, पहले सीएए आयेगा, फि‍र एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जायेगा!’ इसके जवाब में शाहीन बाग, दिल्ली की बहादुर औरतों ने एक ऐसा आन्दोलन खड़ा किया जो देश भर में संघर्ष की मिसाल बन गया। थोड़े समय में ही देश में 50 से भी ज़्यादा जगहों पर शाहीन बाग जैसे ही दिनो-रात चलने वाले धरने शुरू हो गये। छोटे क़स्बों से लेकर बड़े महानगरों तक पिछले डेढ़ महीने से लाखों लोग लगातार सड़कों पर हैं।

CAA+NPR+NRC सभी के लिए क्यों ख़तरनाक हैं

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) अपने आप में एक ग़लत क़ानून है जो धर्म के आधार पर एक क़ौम के लोगों को नागरिकता देने से इंकार करता है। मगर राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर),जो देशव्यापी एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) के लिए पहला क़दम है, के साथ मिलकर यह न केवल मुसलमानों के लिए, बल्कि अन्य सभी भारतीयों के लिए विनाशकारी साबित होगा।

आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा जनउभार है सीएए-एनआरसी विरोधी आन्दोलन

देश की जनता को बाँटने और एक बडी आबादी को सरमायेदारों को दोयम दर्जे का निवासी और सरमायेदारों का गुलाम बना देने के इरादे से देश पर थोपे जा रहे सीएए-एनआरसी के विनाशकारी ‘प्रयोग’ के विरुद्ध देशव्‍यापी आन्‍दोलन सत्ता के सारे हथकण्‍डों के बावजूद मज़बूती से डटा हुआ है और इसका देश के नये-नये इलाक़ों में विस्‍तार हो रहा है। दिल्‍ली का शाहीन बाग इस आन्‍दोलन का एक प्रतीक बन गया है और दिनो-रात के धरने का उसका मॉडल पूरे देश में अपनाया जा रहा है।

दिल्‍ली विधानसभा चुनाव 2020 में फिर से आम आदमी पार्टी की जीत के मायने: एक मज़दूर वर्गीय नज़रिया

जिन्‍होंने भी केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के पूरे चुनाव अभियान को क़रीबी से देखा है, वह अच्‍छी तरह जानते हैं कि भाजपा के हिन्‍दुत्‍ववादी फ़ासीवाद के एजेण्‍डे के बरक्‍स, अरविन्‍द केजरीवाल ने कोई सही मायनों में सेक्‍युलर, जनवादी और प्रगतिशील एजेण्‍डा नहीं रखा था। उल्‍टे केजरीवाल ने ‘सॉफ़्ट हिन्‍दुत्‍व’ का कार्ड खेला। अपने आपको हिन्‍दू, हनुमान-भक्‍त आदि साबित करने में केजरीवाल ने कोई कसर नहीं छोड़ी। साथ ही, कश्‍मीर में 370 हटाने पर मोदी को बधाई देने से लेकर, जामिया और जेएनयू पर हुए पुलिसिया अत्‍याचार और शाहीन बाग़ और सीएए-एनआरसी-एनपीआर जैसे सबसे ज्‍वलन्‍त और व्‍यापक मेहनतकश आबादी को प्रभावित करने वाले प्रमुख मसलों के सवाल पर चुप्‍पी साधे रहने तक, केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने मोदी-शाह-नीत भाजपा के कोर एजेण्‍डा से किनारा काटकर निकल लेने (सर्कमवेण्‍ट करने) की रणनीति अपनायी। तात्‍कालिक तौर पर, इस रणनीति का फ़ायदा आम आदमी पार्टी को मिला है।

होण्डा, शिवम व अन्य कारख़ानों के संघर्ष को पूरी ऑटो पट्टी के साझा संघर्ष में तब्दील करना होगा

मन्दी के नाम पर छँटनी का कहर केवल होण्डा के मज़दूरों पर ही नहीं बल्कि गुड़गाँव और उसके आसपास ऑटोमोबाइल सेक्टर की कंसाई नैरोलक, शिरोकी टेक्निको, मुंजाल शोवा, डेन्सो, मारुति समेत दर्जनों कम्पनियों में लगातार जारी है। दिहाड़ी, पीस रेट, व ठेका मज़दूर तो दूर स्थायी मज़दूर तक अपनी नौकरी नहीं बचा पा रहे हैं। होण्डा, शिवम, कंसाई नैरोलेक आदि कई कम्पनियों के स्थाई श्रमिक निलम्बन, निष्कासन, तबादले से लेकर झूठे केस तक झेल रहे हैं। होण्डा समेत कई कारख़ानों में चल रहे संघर्षों में कैज़ुअल मज़दूरों के समर्थन में उतरे जुझारू मज़दूरों को निलम्बित किया गया है।