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खेतिहर मज़दूरों की बढ़ती आत्महत्याओं के लिए कौन ज़िम्मेदार है?

2011 की जनगणना के अनुसार देश में खेती में लगे हुए कुल 26.3 करोड़ लोगों में से 45% यानी 11.8 करोड़ किसान थे और शेष लगभग 55% यानी 14.5 करोड़ खेतिहर मज़दूर थे। पिछले 10 वर्षों में यदि किसानों के मज़दूर बनने की दर वही रही हो, जो कि 2000 से 2010 के बीच थी, तो माना जा सकता है कि खेतिहर मज़दूरों की संख्या 15 करोड़ से काफ़ी ऊपर जा चुकी होगी, जबकि किसानों की संख्या 11 करोड़ से और कम रह गयी होगी। मगर ग्रामीण क्षेत्र की सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद खेतिहर मज़दूरों की बदहाली और काम व जीवन के ख़राब हालात की बहुत कम चर्चा होती है।

पहली अप्रैल 2021 – देश के करोड़ों मज़दूरों के लिए एक काला दिन

देश के करोड़ों मज़दूरों के लिए पहली अप्रैल 2021 एक काला दिन है। यह वह तारीख़ है जिस दिन से मोदी सरकार ने मज़दूरों के अधिकारों पर अब तक की सबसे बड़ी चोट करने वाले चार लेबर कोड (श्रम संहिताएँ) लागू कर दिये हैं। मज़दूरों के ‍जुझारू संघर्षों के लम्बे इतिहास की बदौलत हमने जो अधिकार हासिल किये थे, जिन्हें विभिन्न श्रम क़ानूनों के रूप में दर्ज किया गया था, उन्हें एक झट‍के में ख़त्म करके चार लेबर कोड लागू कर दिये गये हैं जिनका एक ही मक़सद है – मज़दूरों को लूटने-खसोटने और जब चाहे रखने, जब चाहे बाहर करने की मालिकों को खुली छूट और मज़दूरों के लिए आवाज़ उठाना और संगठित होना ज़्यादा से ज़्यादा मुश्किल बना देना।

कौन हैं देविन्दर शर्मा और उनका “अर्थशास्त्र” और राजनीति किन वर्गों की सेवा करती है?

कोई भी संजीदा कम्युनिस्ट मौजूदा धनी किसान आन्दोलन की माँगों (मूलत: लाभकारी मूल्य की माँग) का समर्थन नहीं कर सकता है, क्योंकि पिछले कई दशकों के दौरान मार्क्सवादी और ग़ैर-मार्क्सवादी अध्येता यह दिखला चुके हैं कि लाभकारी मूल्य की पूरी व्यवस्था ग़रीब-विरोधी है और शुद्धत: धनी किसानों को राजकीय हस्तक्षेप द्वारा व्यापक मेहनतकश ग़रीब जनता की क़ीमत पर दिया जाने वाला बेशी मुनाफ़ा व लगान है।

ओखला औद्योगिक क्षेत्र : मज़दूरों के काम और जीवन पर एक आरम्भिक रिपोर्ट

चौड़ी-चौड़ी सड़कों के दोनों तरफ़ मकानों की तरह बने कारख़ाने एक बार को देख कर लगता है कि कहीं यह औद्योगिक क्षेत्र की जगह रिहायशी क्षेत्र तो नहीं। कई कारख़ाने तो हरे-हरे फूलदार गमलों से सज़े इतने ख़ूबसूरत मकान से दिखते हैं कि वहम होता है शायद यह किसी का घर तो नहीं। लेकिन नहीं ओखला फेज़ 1 और ओखला फेज़ 2 के मकान जैसे दिखने वाले कारख़ाने और कारख़ानों जैसे दिखने वाले कारख़ाने, सभी एक समान मज़दूरों का ख़ून निचोड़ते हैं…

फ़ूड डिलीवरी कम्पनियों में कर्मचारियों के नारकीय हालात

कोरोना लॉकडाउन के दौरान फ़ूड डिलीवरी कम्पनियों ने जमकर मुनाफ़ा कमाया। महामारी के दौरान घरों में बन्द लोगों को खाने-पीने की चीज़ें पहुँचाने के काम पर सरकार द्वारा रोक नहीं लगायी गयी थी इसलिए अपनी रोज़ी कमाते रहने के लिए अप्रैल-मई की चिलचिलाती धूप में भी फ़ूड डिलीवरी कर्मचारी कोरोना महामारी के साये में यह काम करते रहे। सरकार और कम्पनी दोनों की तरफ़ से ही उनके इस कठिन काम की तारीफ़ की जाती रही। मोदी ने उन्हें ‘फ़्रण्टलाइन वर्कर’ कहा तो वहीं कम्पनियों ने उन्हें ‘हीरो’ कहा।

फ़ासीवादी सरकार द्वारा प्रायोजित दिल्ली दंगों का एक साल

पिछले साल देश की राजधानी दिल्ली के उत्तर-पूर्वी दिल्ली क्षेत्र में 23 फ़रवरी से 25 फ़रवरी को जो हिंसा हुई, उसे मीडिया द्वारा ‘दिल्ली दंगा-2020’ का नाम दिया गया। इस हिंसा में तक़रीबन 55 लोगों की मौत हुई, 200 से अधिक लोग घायल हुए और अरबों की सम्पत्ति का नुक़सान हुआ। जिन दिल्ली दंगों को गोदी मीडिया द्वारा हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच हुई हिंसा व दंगा कहा जा रहा है, वे असल में दिल्ली में राज्य की शह पर संघ-भाजपा द्वारा प्रायोजित साम्प्रदायिक हिंसा थी।

सिकुड़ती अर्थव्यवस्था, बढ़ती असमानता

पिछले साल मार्च में शुरू हुए लॉकडाउन और उसके बाद के महीनों में देश के करोड़ों लोगों का रोज़गार छिन गया। बहुत बड़ी आबादी दो वक़्त की रोटी के लिए भी मुहताज हो गयी। बेरोज़गारी, भूख और अभाव का यह सिलसिला लगातार जारी है। बेलगाम बढ़ती महँगाई ग़रीबों की थाली को और भी ख़ाली करती जा रही है। दूसरी ओर, देश के सबसे बड़े अमीरों की दौलत में बेहिसाब बढ़ोत्तरी हो रही है।

क्या सारे किसानों के हित और माँगें एक हैं?

जब तक सामन्तवाद था और सामन्ती भूस्वामी वर्ग था, तब तक धनी किसान, उच्च मध्यम किसान, निम्न मध्यम किसान, ग़रीब किसान व खेतिहर मज़दूर का एक साझा दुश्मन था। आज निम्न मँझोले किसानों, ग़रीब किसानों व खेतिहर मज़दूरों के वर्ग का प्रमुख शोषक और उत्पीड़क कौन है? वे हैं गाँव के पूँजीवादी भूस्वामी, पूँजीवादी फ़ार्मर, सूदखोर और आढ़तियों-बिचौलियों का पूरा वर्ग। इस शोषक वर्ग की माँगें और हित बिल्कुल अलग हैं और गाँव के ग़रीबों की माँगें और हित बिल्कुल भिन्न हैं।

कोविड 19 वैक्सीन : एक पड़ताल

बीता साल पूरी तरह से कोरोना वायरस के नाम रहा। पूरे साल कोरोना वायरस (SARS CoV 2) ने पूरे विश्व में क़हर बरपा कर रखा हुआ था। नये साल में हालाँकि इसके केसों में काफ़ी हद तक कमी आई है और अब अलग-अलग वैक्सीन भी आ चुकी हैं लेकिन फिर भी यह बीमारी पूरी तरह से कब तक क़ाबू में आयेगी कुछ कहा नहीं जा सकता।

केन्द्रीय बजट : पूँजीपरस्त नीतियों पर जनपक्षधरता का मुलम्मा चढ़ाने का प्रयास

गत एक फ़रवरी को केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा संसद में वित्तीय वर्ष 2021-22 का बजट प्रस्तुत करने के बाद शेयर बाज़ार में रिकॉर्डतोड़ उछाल देखने में आया। वजह साफ़ थी! यह बजट पूँजीपतियों के लिए मुँहमाँगे तोहफ़े से कम नहीं था।
टीवी चैनलों पर पूँजीपतियों के भाड़े पर काम करने वाले भाँति-भाँति के विशेषज्ञों ने इस बजट की तारीफ़ों के पुल बाँधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। किसी ने बजट को ऐतिहासिक बताया तो किसी ने इसे अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी की संज्ञा दी। लेकिन सच्चाई तो यह थी कि यह बजट आर्थिक संकट के दौर में मुनाफ़े की गिरती दर के ख़तरे से बिलबिलाये पूँजीपति वर्ग के लिए संजीवनी के समान था।