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जनता के विरोध से घबराकर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लगाया एस्मा!

उत्तर प्रदेश में लगे एस्मा का खास महत्व है। इसे हमें उत्तर प्रदेश के विभिन्न विभागों में बढ़ते असंतोष को दबाने के क्रम में देखने की ज़रूरत है। इस समय उत्तर प्रदेश में गहराते आर्थिक संकट, बिजली संकट और इन संकटों की वजह से बढ़ते जनाक्रोश की परिस्थिति से निपटने के लिए एस्मा लगाया गया है। अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनावों से पहले योगी सरकार अपने कुशासन और जनविरोधी शासन के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिरोध को पनपने से पहले ही कुचल देने कि कोशिशें कर रही है। इसीलिए योगी सरकार कभी एस्मा लगाती है तो कभी मज़दूर कार्यकर्ताओं के ऊपर रासुका जैसा दमनकारी क़ानून लगा दिया जाता है ताकि लोग अपनी बुनियादी माँगों मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार, आवास, न्यूनतम वेतन आदि के लिए एकजुट और संगठित न हो सकें।

“आँकड़े छिपाओ, बेरोज़गारी भगाओ!” बेरोज़गारी से लड़ने का मोदी सरकार का नायाब नुस्ख़ा

ज्ञात हो कि भारत की लगभग 93% कार्यशक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करती है, लेकिन इस सरकारी सर्वेक्षण में उनके काम करने की स्थिति, काम के घण्टे, औसत मज़दूरी या वेतन और काम की प्रकृति का कोई आँकड़ा मौजूद नहीं। सरकार के लिए अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली आबादी का अस्तित्व ही नहीं है! सरकार द्वारा मान्य रोज़गार की परिभाषा के अनुसार अनौपचारिक क्षेत्र के दिहाड़ी, ठेका व कैजुअल मज़दूरों की एक बड़ी संख्या, जिनके पास कोई रोज़गार सुरक्षा नहीं है, को भी रोज़गारशुदा क़रार दे दी गया है। वहीँ दूसरी ओर 2025 के सर्वेक्षण में श्रमशक्ति भागीदारी दर (LFPR)  में जिस बढ़ोतरी को दिखाया गया है, उसका मुख्य कारण तथाकथित स्वरोज़गार में हुई वृद्धि है। लेकिन इन स्वरोज़गार करने वालों की स्थिति क्या है? यदि कोई व्यक्ति ढंग का रोज़गार न मिलने की सूरत में कहीं ठेला लगाकर या चाय स्टॉल लगाकर या फ़िर ई-रिक्शा/ऑटो चलाकर मुश्किल से अपनी रोज़ी कमा रहा है, या कोई छोटी जोत का ग़रीब किसान, जिसकी जोत से उसके खाने-पीने व दवा-इलाज का बुनियादी ख़र्च भी मुश्किल से जुट पा रहा हो, तो ऐसे तमाम व्यक्तियों को स्वरोज़गार के नाम पर रोज़गारशुदा मानना कितना वाजिब है?! जिनको नौकरी नहीं मिलती, वे सारे लोग आत्महत्या थोड़े ही कर लेते हैं! वे तथाकथित स्वरोज़गार कर किसी तरह से भुखमरी रेखा पर जीवित रहते हैं और मानवीयता से रिक्त पाशविक जीवन जीने को मजबूर होते हैं।

क्यों लगातार गिर रहा है भारतीय रुपया?

मोदी सरकार और उसके मन्त्रियों द्वारा रुपये के बेतरह गिरने के फ़ायदे बताने या फिर उसके नक़ली कारण बताने के प्रयास वास्तव में कुछ बुनियादी बातों को छिपाने के लिए हैं : एक, भारतीय अर्थव्यवस्था ढाँचागत तौर पर लाभप्रदता के संकट से गुज़र रही है; दो, इस संकट को और भी ज़्यादा विकराल बनाने में मोदी सरकार द्वारा किया गया अर्थव्यवस्था का कुप्रबन्धन और उसकी विवेकहीन विदेश नीति ज़िम्मेदार है; तीन, वास्तव में मन्दी झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले ही मोदी सरकार ने जो दो भूकम्प-समान झटके दिये थे, यानी नोटबन्दी और फिर योजनाविहीनता और तानाशाहाना तरीक़े से लागू किया गया कोविड लॉकडाउन, उससे भारतीय अर्थव्यवस्था कभी ढंग से उबर ही नहीं पायी थी; चार, देश के बड़े पूँजीपति वर्ग की चाव से सेवा करने के चक्कर में मोदी सरकार ने पूँजीवादी मानदण्डों से भी संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था का आश्चर्यजनक कुप्रबन्धन किया है। अब इन चीज़ों का नतीजा देश की जनता भुगत रही है। अगर आर्थिक कारकों की गति का अध्ययन किया जाये तो स्पष्ट है कि इस बात की पर्याप्त सम्भावना है कि अभी हम संकट का कम बुरा दौर ही देख रहे हैं। संकट का सबसे बुरा दौर अभी आना है। इसकी भी पूरी गुंजाइश है कि देश के सबसे धनी पूँजीपतियों पर संकट को कोई बोझ न पड़े इसे सुनिश्चित करने के लिए मोदी सरकार जनता से फिर से पेट पर पट्टी बाँधने के लिए कहेगी, कुछ दिन माँगेगी, उससे भी बात नहीं बनेगी तो साम्प्रदायिक तनाव को नये सिरे से भड़कायेगी और जनसंख्या पर आयोग बनाकर दरअसल मोदी सरकार यही करने वाली है। मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने का झूठा हौव्वा खड़ा किया जायेगा, नये सिरे से “हिन्दू ख़तरे में है” के दावे किये जायेंगे।

बारह साल, जनता बेहाल – टूटे सपनों का अम्बार! कौन है इसका ज़िम्मेदार ?

एक ऐसे समय में जब जनता कमरतोड़ महँगाई और विकराल बेरोज़गारी की मार झेल रही है, जब देश के छात्र-युवा बरबाद होती शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था का नतीजा भुगत रहे हैं, जब देश के अल्पसंख्यक, विशेष तौर पर, मुसलमान साम्प्रदायिक तनाव और विषवमन के शिकार बन रहे हैं, जब स्त्री-विरोधी व दलित-विरोधी अपराध अपने चरम पर हैं, जब देश के ग़रीब छोटे किसान हर रोज़ तबाह हो रहे हैं और आत्महत्याएँ कर रहे हैं, उस समय नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व के 12 साल पूरे होने का भाजपा द्वारा मनाया जा रहा यह जश्न जनता के दुख-दर्द के साथ क्या एक भद्दा मज़ाक और राजनीतिक अश्लीलता की पराकाष्ठा नहीं है?

नोएडा और मानेसर के मज़दूर संघर्षों में कौन “बाहरी” और कौन “भीतरी”

जब भी कहीं मज़दूरों की कोई हड़ताल या आन्दोलन शुरू होता है, तो उसमें सक्रिय ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और मज़दूर संगठन के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस प्रशासन और सरकार “बाहरी तत्व” होने की तोहमत लगाते हैं। उनके अनुसार, जो स्वयं उस शहर या औद्योगिक क्षेत्र में कारखाने में काम नहीं करता, उसे मज़दूरों के मसले पर बोलने का या उनके आन्दोलन में शिरक़त करने का कोई अधिकार नहीं है। यह हुक्मरानों का पुराना “तर्क” है। बल्कि कहना चाहिए कि कुतर्क है। नोएडा के मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय मज़दूर कार्यकर्ताओं, श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं, छात्र कार्यकर्ताओं और उसका समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों मसलन सत्यम वर्मा, आदित्य आनन्द, रूपेश राय, हिमांशु ठाकुर, सृष्टि, आकृति आदि पर नोएडा पुलिस ने यही “बाहरी” होने का आरोप लगाया। उसी प्रकार मानेसर में गिरफ्तार कार्यकर्ता साथियों श्यामबीर और हरीश पर भी ये ही आरोप लगाये गये हैं। तो हमें इस आरोप का पूरा कुतर्क समझ लेना चाहिए।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था और विज्ञान के विकास की पोल खुल गयी एआई समिट और गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्रकरण में

ऐसा नहीं है कि यह विज्ञान और तर्कणा विरोधी बातें बस बयानबाज़ी तक सीमित हैं। सरकार द्वारा सांस्थानिक रूप से छद्म विज्ञान को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश की जा रही है। सरकार द्वारा शिक्षा को लेकर लायी गयी तमाम नितियाँ और उठाये गये सारे क़दम यह साफ़-साफ़ बताते हैं कि कैसे योजनाबद्ध तरीक़े से शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है और इसे बर्बाद किया जा रहा है। छात्रों के तर्क करने की शक्ति पर हमला किया जा रहा है, उनकी आलोचनात्मक क्षमता को बाधित करके उसे सचेतन तौर कुन्द किया जा रहा है, वे सरकार की किसी भी नीति या बात पर सवाल न खड़ा करें, बस चुपचाप अनुशासित होकर फ़ासीवादी सरकार के हुक्म की तामील करें इसके लिए ही उन्हें अवैज्ञानिक और अतार्किक बनाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है ताकि उन्हें आसानी से फ़ासीवादी उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनाया जा सके। पाठ्यक्रम से उद्भव के सिद्धान्त, पीरियॉडिक टेबल आदि विषयों का हटाया जाना, इतिहास का मिथ्याकरण करना आदि इसी दूरगामी फ़ासीवादी परियोजना के परिणाम हैं।

फ़ासीवादियों और ज़ायनवादियों की प्रगाढ़ होती एकता!

नरेन्द्र मोदी द्वारा इज़रायल की यह दो-दिवसीय यात्रा एक ऐसे समय में हुई है जब जेफ़री एपस्टीन जैसे पतित व्यक्ति के साथ भाजपा के नेताओं-मंत्रियों और अम्बानी जैसे पूँजीपतियों की संलिप्तता का मामला सामने आया था। जेफ़री एप्सटीन एक गलीज़ नरभक्षी था और बच्चियों के साथ बलात्कार व यौन अपराध का अन्तरराष्ट्रीय रैकेट चलाता था। उसके घृणित कारनामे न केवल पूँजीवादी समाज की सड़ाँध और गलाज़त को प्रदर्शित करते हैं बल्कि दुनिया भर के शासक वर्गों की पतनशीलता को भी उघाड़ कर रख देते हैं। ऐसे घृणित व्यक्ति के साथ भाजपा के नेताओं और खुद नरेन्द्र मोदी के कथित सम्बन्ध आम जनता के लिए कई सवाल खड़े कर रहे थे। एप्स्टीन 2008 में ही यौन अपराधी साबित हो चुका था, मगर इसके बावजूद 2017 में अनिल अम्बानी, हरदीप सिंह पुरी आदि का एप्सटीन के साथ मेलजोल और अमेरिकी अधिकारियों के साथ मीटिंग्स का कार्यक्रम बनाना किन वज़हों से हो सकता है? क्या यह राजनीतिक व व्यापारिक फ़ायदों के लिए था या फ़िर निजी फ़ायदों के लिए? एप्स्टीन स्वयं एक ज़ायनवादी था और इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी मोस्साद का एजेण्ट था। उसके साथ रिश्तों की बात सामने आने पर दुनिया के कई रसूख़दार व्यक्तियों को गिरफ़्तार किया गया है और कई से उनके पदों से इस्तीफ़े ले लिये गये हैं। सिर्फ़ डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका और मोदी का भारत ही ऐसे देश हैं, जहाँ एप्सटीन फ़ाइलों में नाम आने के बाद भी किसी पर कार्रवाई तो दूर, जाँच की भी घोषणा नहीं की गयी है। सवाल है कि 2008 में एप्स्टीन की घिनौनी असलियत दुनिया के सामने आने के बाद भी भाजपा के नेताओं की बातचीत ऐसे घृणित, बलात्कारी व्यक्ति के साथ क्यों हो रही थी?

ईरान पर अमेरिका-इज़रायल द्वारा थोपा गया साम्राज्यवादी युद्ध अमेरिकी साम्राज्यवाद और इज़रायली सेटलर उपनिवेशवाद की शर्मनाक हार के साथ ख़त्म होगा

ईरान युद्ध विश्व की राजनीति में एक नयी करवट की ओर ले जा रहा है। इस युद्ध के बाद साम्राज्यवाद के वैश्विक समीकरणों में निश्चित ही परिवर्तन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इससे सर्वाधिक फ़ायदा रूस-चीन साम्राज्यवादी धुरी को मिलेगा और सबसे ज़्यादा नुक़सान अमेरिका-ब्रिटेन धुरी व यूरोपीय संघ धुरी को होगा। पश्चिमी साम्राज्यवाद की दोनों ही धुरियों के बीच की और उनकी आन्तरिक एकता भी भयंकर दबाव में है। नतीजतन, आने वाले समय में साम्राज्यवाद का राजनीतिक संकट और गहरायेगा और कालान्तर में इससे भी बड़े युद्धों को जन्म देगा। ये युद्ध पूरी दुनिया में ही जनता के लिए भयंकर स्थितियाँ पैदा करेंगे लेकिन विशेष तौर पर सापेक्षिक रूप से पिछड़े पूँजीवादी देशों में जनअसन्तोष बेहद तेज़ी से बढ़ेगा। क्रान्तिकारी शक्तियों को इस आने वाले समय की तैयारी तत्काल करनी होगी। मज़दूर वर्ग के हिरावल को आने वाले उथल-पुथल के लिए अपने आपको तैयार करना होगा।

पूँजीवादी व्यवस्था और युवा आबादी को अनियमित व अनौपचारिक क्षेत्र में धकेले जाने की बाध्यता

इस रिपोर्ट से तीन बातें बहुत स्पष्ट हैं। पहला, युवा आबादी के लिए पक्के व नियमित रोज़गार के अवसर तेज़ी से घटते जा रहे हैं। युवाओं को अनियमित और अनौपचरिक क्षेत्रों में काम के लिए धकेला जा रहा है। दूसरे, देश में अलग-अलग राज्यों के स्तर पर रोज़गार सृजन में बहुत असमानता है। तीसरे, कार्यस्थल तथा रिहाइश में दूरी के चलते आवागमन काम के समय में अतिरिक्त समय का बोझ बढ़ा देता है।

12 फ़रवरी की “हड़ताल” से मज़दूरों को क्‍या हासिल हुआ ?

हड़ताल मज़दूर वर्ग के सबसे अहम हथियारों में से एक होता है। एक अकेले मज़दूर का पूँजीवादी समाज में कोई मूल्‍य नहीं होता है। लेकिन पूँजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था और राजनीतिक व्‍यवस्‍था और समूचा पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के श्रम के शोषण पर ही आधारित होता है। इसलिए एक वर्ग के तौर पर, मज़दूर वर्ग की सामूहिक शक्ति से बड़ी शक्ति और कोई नहीं। पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के बेशी श्रम को निचोड़कर ही ज़‍िन्‍दा रहता है। उसके मुनाफ़े का स्रोत मज़दूरों की मेहनत होती है। समूचा समाज ही मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी के श्रम पर टिका होता है। ऐसे में, मज़दूर वर्ग यदि काम रोक दे तो मुनाफ़े का चक्‍का भी ठप्‍प हो जाता है। हड़ताल का अर्थ होता है मज़दूर वर्ग द्वारा अपनी माँगों की पूर्ति के लिए काम रोकना, मुनाफ़े के चक्‍के को ठप्‍प करना और पूँजीपति वर्ग और उसकी राज्‍यसत्‍ता को बाध्‍य करना कि वह उसकी माँगों को पूरा करे। क्‍या 12 फ़रवरी को केन्‍द्रीय ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशनों के नेतृत्‍व ने वाकई हड़ताल का आयोजन करवाया? आप सभी इस सवाल का जवाब जानते हैं। हर जगह पर हड़ताल के नाम पर एकदिनी रस्‍मी विरोध प्रदर्शन, जुलूस-जलसा कर दिया गया, ताकि मज़दूर वर्ग का बढ़ता असन्‍तोष कुछ हद तक निकल जाये।