दिल्ली के विधायकों के वेतन में 300 प्रतिशत वृद्धि और मज़दूरों के वेतन में 15 प्रतिशत की वृद्धि
अगर मज़दूरों के हालात पर नज़र डाली जाये तो मौजूदा समय में दिल्ली में 45 लाख मज़दूरों की संख्या असंगठित क्षेत्र मे कार्यरत है; जिसमें से एक-तिहाई आबादी व्यापारिक प्रतिष्ठानों, होटलों और रेस्तरों आदि में लगी हुई है। करीब 27 प्रतिशत हिस्सा मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र, यानी कारखाना उत्पादन में लगा हुआ है। जबकि निर्माण क्षेत्र यानी इमारतें, सड़कें, फ्लाईओवर आदि बनाने का काम करने में भी लाखों मज़दूर लगे हुए हैं। ये ज़्यादातर मज़दूर 12-14 घण्टे खटने के बाद मुश्किल से 3000 से 4000 रुपये कमा पाते हैं, यानी मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी क़ानून या आठ घण्टे के क़ानून का कोई मतलब नहीं रह जाता है बाकी ईएसआई, पीएफ़ जैसी सुविधाएँ तो बहुत दूर की बात है। दिल्ली की शान कही जाने वाली जाने वाली मेट्रो रेल में तो न्यूनतम मज़दूरी की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। वैसे खुद दिल्ली सरकार की मानव विकास रपट 2006 में यह स्वीकार किया गया है कि ये मज़दूर जिन कारख़ानों में काम करते हैं उनमें काम करने की स्थितियाँ इन्सानों के काम करने लायक नहीं हैं।




















