Category Archives: महान जननायक

अतिरिक्त ज्ञान / लू-शुन

लेकिन अतिरिक्त ज्ञान भी एक “वस्तुगत सच्चाई”  है और इससे पैदा होने वाला संकट भी। जब ज़रूरत से ज़्यादा आपके पास ज्ञान हो जाता तो आप या तो बहुत ज़्यादा कल्पनाशील हो जाते हैं या बहुत ज़्यादा नरमदिल। अगर आप बहुत ज़्यादा कल्पनाशील होंगे तो आप बहुत ज़्यादा सोचेंगे। अगर आप बहुत ज़्यादा नरमदिल होंगे तो आप निर्मम नहीं हो पायेंगे या तो आप अपना सन्तुलन खो बैठेंगे या फिर दूसरों के सन्तुलन के साथ छेड़छाड़ करेंगे, और इसी तरह आपदा आती है। इसीलिए ज्ञान को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए।

119वें जन्मदिवस (28 सितम्बर) के मौक़े पर शहीद-ए-आज़म भगतसिंह की संस्मृतियाँ

उनका कहना था कि अंग्रेज़ी दासता के विरुद्ध संघर्ष तो हमारे युद्ध का पहला मोर्चा है। अन्तिम लड़ाई तो हमें शोषण के विरुद्ध ही लड़नी पड़ेगी। चाहे वह शोषण मनुष्य द्वारा मनुष्य का हो या एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का हो। यह लड़ाई जनता के सहयोग के बग़ैर नहीं लड़ी जा सकती। इसलिए हमें हर सम्भव उपायों से जनता के अधिक से अधिक निकट पहुँचने का प्रयास करते रहना चाहिए। नौजवान भारत सभा की स्थापना, मज़दूर सभा में काम, पत्र-पत्रिकाओं में लेख-मालाएँ, मैजिक लैटर्न का प्रयोग, पर्चे और पैम्पलेट आदि इसी प्रयास के अंग थे।

जन साहित्यकार एदुआर्दो गालिआनो के जन्मदिवस (3 सितम्बर) पर उनकी रचनाओं से दो अंश

हर व्यक्ति अपनी ख़ुद की रोशनी से चमकता है। कोई भी दो लपटें एकसमान नहीं होतीं। छोटी लपटें हैं और बड़ी लपटें हैं, हर रंग की लपटें हैं। कुछ लोगों की लपटें इतनी स्थिर हैं कि वे हवा में फड़फड़ाती तक नहीं, जबकि कुछ की उग्र लपटें हैं जो हवा को स्फुलिंगों से भर देती हैं। कुछ गावदी लपटें हैं जो न जलती हैं न रोशनी देती हैं, लेकिन कुछ दूसरी इतनी प्रचण्डता के साथ ज़िन्दगी से धधकती रहती हैं कि कोई बिना पलक झपकाये उनकी ओर देख नहीं सकता और अगर कोई उनके पास जाता है तो आग में चमकने लगता है।

शहीद राजगुरू के जन्मदिवस 24 अगस्त पर क्रान्तिकारी सलाम

ऐसा लगता है कि फाँसी का तख़्ता गिर जाने के बाद दिल की धड़कन बन्द होने से पूर्व भी, यदि राजगुरु फाँसी की काली टोपी के बाहर आँख खोलकर एक बार देख सकते, तो उस दीवाने ने यही देखने की कोशिश की होती कि भगतसिंह मुझसे पहले ही तो नहीं।

अय्यंकालि के जन्मदिवस पर

28 अगस्त को अय्यंकालि का 157वां जन्मदिवस है। कई जाति-विरोधी व्यक्तियों को खुद भारत की सरकार ने आज़ादी के बाद से ही प्रचारित-प्रसारित किया है लेकिन अय्यंकालि को नहीं। क्यों? क्योंकि अय्यंकालि आमूलगामी तरीके से और जुझारू तरीके से सड़क पर उतरकर संघर्ष का रास्ता अपनाते थे; क्योंकि अय्यंकालि सरकार की भलमनसाहत या समझदारी के भरोसे नहीं थे, बल्कि जनता की पहलकदमी पर भरोसा करते थे। यही कारण है कि सरकार अय्यंकालि के जन्मदिवस पर कोई समारोह नहीं करती, कोई छुट्टी घोषित नहीं करती, उनकी तस्वीरें जगह-जगह नहीं लगायी जातीं और न ही उनकी प्रतिमाएँ खड़ी की जाती हैं। अय्यंकालि के रास्ते और विचारों के इस पक्ष को हमसे बचाकर रखती है।

भगतसिंह – बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान का एक अंश

समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।

जब तक इंसानों के हाथों इंसानों का शोषण जारी रहेगा, तब तक मार्क्स के क्रान्तिकारी विचार शासक वर्गों को दु:स्वप्न देते रहेंगे

पूँजीवादी संकट एक दोहरी सम्भावना को जन्म देते हैं: पूँजीवाद से बेहतर एक न्यायपूर्ण और समानतामूलक व्यवस्था की स्थापना यानी समाजवाद की स्थापना या फिर पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा विनाश का उत्तरोत्तर बर्बरता, यानी प्रतिक्रियावाद, तानाशाही, युद्ध और तबाही, की ओर जाना। एक क्रान्तिकारी वैज्ञानिक के तौर पर इन दोनों सम्भावित नतीजों की पहचान ज़रूरी है। लेकिन हमारा क्रान्तिकारी आशावाद हमें यह भी बताता है कि प्रबल सम्भावना यह है कि ऐसी बर्बरता की मंज़िल पूर्ण हो, इससे पहले दुनिया भर की मेहनतकश जनता उठ खड़ी होगी और समाज को एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की ओर ले जायेगी, वह पूँजीवाद को दुनिया को तबाह नहीं करने देगी।

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस (23 मार्च) पर साम्राज्यवाद, पूँजीवाद के बारे में उनके विचार

हम मानते हैं कि स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का अमिट अधिकार है। हर मनुष्य को अपने श्रम का फल पाने-जैसा सभी प्रकार का अधिकार है और प्रत्येक राष्ट्र अपने मूलभूत प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण स्वामी है। अगर कोई सरकार जनता को उसके इन मूलभूत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह अधिकार ही नहीं बल्कि आवश्यक कर्तव्य भी बन जाता है कि ऐसी सरकार को समाप्त कर दे।…

साम्प्रदायिक जुनून का मुकाबला करते हुए शहीद होने वाले महान क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के शहादत दिवस (25 मार्च) के अवसर पर

देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निस्सन्देह, अत्यन्त बुरा था, जिस दिन स्वाधीनता के क्षेत्र में ख़िलाफ़त, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचार्यों को स्थान देना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हटकर रखा था। हमें अपने उसी पाप का फल भोगना पड़ रहा है। देश की स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचार्य को देश के सामने दूसरे रूप में पेश कर उन्हें अधिक शक्तिशाली बना दिया और हमारे इस काम का फल यह हुआ कि इस समय हमारे हाथों ही से बढ़ायी इनकी और इनके जैसे लोगों की शक्तियाँ हमारी जड़ उखाड़ने और देश में मजहबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं।

काकोरी ऐक्शन के क्रान्तिकारियों के शहादत दिवस पर – धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! एकजुट होकर संघर्ष करो!!

17 और 19 दिसम्बर की तारीख़ को काकोरी ऐक्शन के क्रान्तिकारियों ने अपनी शहादत से अमर बना दिया है। देश के इन चार बहादुर बेटों के नाम थे – राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफ़ाक़उल्ला खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह। 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी में क्रान्तिकारियों ने ट्रेन में जा रहे अंग्रेज़ी सरकार के ख़ज़ाने को लूट लिया था। यह घटना लूट और अन्याय पर टिकी अंग्रेज़ी हुकूमत के गालों पर एक करारा तमाचा थी। इस घटना से बौखलायी ब्रिटिश सरकार ने इन क्रान्तिकारियों की धरपकड़ शुरू की। इसके बाद 1927 में 17 दिसम्बर के दिन गोण्डा में राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी और 19 दिसम्बर को गोरखपुर में राम प्रसाद बिस्मिल, फ़ैज़ाबाद में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान और इलाहाबाद में रोशन सिंह को अंग्रेज़ों ने फाँसी दी थी। कई अन्य क्रान्तिकारियों को काला पानी और कठोर कारावास की सज़ा मिली। चन्द्रशेखर आज़ाद अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आये। ये सभी क्रान्तिकारी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) से जुड़े हुए थे।