एक पंजाबी मज़दूर के शब्द ‘प्रवासी मज़दूरों ने पंजाब को गन्दा कर दिया है’ – क्या वाक़ई ऐसा है?
प्रवास करना मज़दूरों का शौक़ नहीं मजबूरी है। दूसरे मज़दूरों का पंजाब आना और पंजाबी मज़दूरों का विदेशों में जाना पूँजीवादी ढाँचे की नीतियों के कारण ही है। अगर आदमी को उसकी पारिवारिक रिहाइश के पास काम मिलेगा तो वह प्रवास नहीं करेगा, वो उसी जगह काम करने को तरजीह देगा और ऐसे विवाद भी खड़े नहीं होंगे। पर पूँजीवादी ढाँचे के अन्तर्गत विकास असमान होता है। पूँजीपति सस्ती श्रम शक्ति के साथ-साथ कारख़ाने के लिए सस्ते कच्चे माल की उपलब्धता, आवागमन के साधन, तैयार माल के लिए मण्डी, स्थानीय सरकार का कारख़ाने के प्रति नरम रुख़ आदि को ध्यान में रखकर ही कारख़ाना लगाता है ना कि लोगों के रोज़गार की ज़रूरतों को ध्यान में रख कर। यह असमान विकास कुछ क्षेत्रों में ज़्यादा तरक़्क़ी और कुछ को पीछे ले जाता है। यह पिछड़े हुए क्षेत्र उन्नत क्षेत्रों की तरफ़ सस्ती श्रम शक्ति के लगातार प्रवाह को यक़ीनी बनाते हैं। पक्के रोज़गार का न मिलना और पूँजीवादी विकास के फलस्वरूप छोटे-मोटे धन्धों का चौपट होना है इस प्रवाह को और तेज़ कर देता है। आज हमारे देश के ऐसे ही हालात हैं।सारे नागरिकों को पक्का रोज़गार, मुफ़्त शिक्षा और स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएँ देना सरकार की ज़िम्मेदारी और लोगों का संवैधानिक























