Category Archives: कारख़ाना इलाक़ों से

फैक्ट्रियों के अनुभव और मज़दूर बिगुल से मिली समझ ने मुझे सही रास्ता दिखाया है

यह साफ़ था कि हमारे हाथ में कुछ नहीं था और हम लोग मानसिक रूप से परेशान रहने लगे। इस प्रकार अपना हुनर चमकाने और इसे निखारने का भूत जल्द ही मेरे सिर से उतर गया। मेरा वेतन 8,000 रुपये था किन्तु काट-पीटकर मात्र 6,800 रुपये मुझे थमा दिये जाते थे। मानेसर जैसे शहर में इतनी कम तनख़्वाह से घर पर पैसे भेजने की तो कोई सोच भी नहीं सकता, अपना ही गुज़ारा चल जायेे तो गनीमत समझिए, बल्कि कई बार तो उल्टा घर से पैसे मँगाने भी पड़ जाते थे।

यूनियन बनाने की कोशिश और माँगें उठाने पर ठेका श्रमिकों को कम्पनी ने निकाला, संघर्ष जारी

केन्द्र में भाजपा की फासीवादी मोदी सरकार तो खुल्ले तौर पर मज़दूरों की विरोधी है ही लेकिन दिल्ली का ये नटवरलाल जो कि छोटे बनिये-व्यापारी का प्रतिनिधित्व करता है किसी भी मायने में मोदी से कम नहीं है! जिन तथाकथित ‘लिबरल जन’ का भरोसा इस नटवरलाल पर है और जो इसे मोदी का विकल्प समझ रहे हैं, उन्हें भी अब अपनी आँखे खोल लेनी चाहिए।

ऑटोमैक्स में तालाबंदी के ख़ि‍लाफ़ आन्दोलन

इस चीज की चर्चा करना भी जरूरी है कि इस कम्पनी में  पिछले 20-25 सालों में 30-40 श्रमि‍कों के हाथ कटे हैं और किसी का हाथ, बाजू, अंगूठा और कुछ श्रमिकों का तो एक बार ज़्यादा कटा है और कई श्रमिकों के तो पैर कटे हैं। आज तक किसी को कोई उचित मुआवजा नहीं मिला।

दिल्ली आँगनवाड़ी की महिलाओं की हड़ताल जारी है !

केन्द्र में भाजपा की फासीवादी मोदी सरकार तो खुल्ले तौर पर मज़दूरों की विरोधी है ही लेकिन दिल्ली का ये नटवरलाल जो कि छोटे बनिये-व्यापारी का प्रतिनिधित्व करता है किसी भी मायने में मोदी से कम नहीं है! जिन तथाकथित ‘लिबरल जन’ का भरोसा इस नटवरलाल पर है और जो इसे मोदी का विकल्प समझ रहे हैं, उन्हें भी अब अपनी आँखे खोल लेनी चाहिए। सरकार और दलाल यूनियनों की सारी कोशिशों के बावजूद आँगनवाड़ी की महिलाएँ अपनी यूनियन ‘दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन’ के नेतृत्व में शानदार तरीक़े से अपनी हड़ताल को चला रही हैं और अपनी एकता के दम पर ज़रूर दिल्ली सरकार को झुकायेंगी!

मालिक का भाई मरे या कोई और, उसे कमाने से मतलब है

मेरी फ़ैक्टरी के मालिक पर जीएसटी का ज़्यादा असर नहीं लगता है। ये तो ख़ूब 12 घण्टे हम जुतवाता है। यह बिल्कुल पैसे का भूखा है। पिछले हफ़्ते मालिक के भाई की मौत हो गयी थी। इलाक़े के सारे मालिक फ़ैक्टरी पर इकठ्ठा थे। मालिक ने फ़ैक्टरी बन्द करने को कहा और हमने राहत की साँस ली पर उसने कहा कि कहीं मत जाना फ़ैक्टरी में ही रहना। एक घण्टे के भीतर ही मालिक कुछ पीले रंग का द्रव्य लेकर आया और उसे फ़ैक्टरी के गेट पर छिड़का और हमें बोला फटाफट काम शुरू करो। मालिक का भाई मरे या कोई और, इसे कमाने से मतलब है।

ऐसे बनता है आपका मोबाइल फ़ोन

इन बैटरियों (लीथीयम-आइन बैटरियाँ) को बनाने के लिए कोबाल्ट नाम की धातु इस्तेमाल की जाती है। इन लीथीयम-आयन बैटरियों का इस्तेमाल ऐपल, सैमसंग, सोनी, माइक्रोसाॅफ़्ट, डेल और बाक़ी कम्पनियाँ करती हैं। अब बात करें कि कोबाल्ट का स्रोत कहाँ है तो दुनिया के ग़रीब देशों में से एक देश (लेकिन कोबाल्ट का अमीर स्रोत) की तस्वीर आँखों के सामने आ जाती है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कोंगो देश जिसकी आबादी 67 मिलीयन है और 2014 में वर्ल्ड बैंक ने इस देश को मानवीय विकास सूचकांक पर पीछे से दूसरा नम्बर दिया है।

बरगदवा औद्योगिक क्षेत्र, गोरखपुर के अंकुर उद्योग कारख़ाने के मज़दूर आन्दोलन की राह पर

फ़ैक्टरी प्रबन्धन द्वारा मज़दूरों के साथ गाली-गलौच,धक्का-मुक्की आम बात है। पीने के साफ़ पानी का कोई इन्तज़ाम नहीं है। शौचालय गन्दगी और बदबू से भरा रहता है, कभी उसकी सफ़ाई नहीं करायी जाती है। इतनी भीषण गर्मी में बिजली का ख़र्च बचाने के लिए सभी एग्झास्ट बन्द रहते हैं, जिससे असह्य तापमान पर काम करने के लिए मज़दूर बाध्य हैं। लगभग 100 मज़दूर जो नियमित साफ़-सफ़ाई का काम करते हैं और इनमें से कई मज़दूर 1998 से ही काम कर रहे हैं, लेकिन इनको केवल 5900 रुपये ही दिया जाता है, जबकि अकुशल मज़दूर की मज़दूरी 7400 रुपये है। पहचान पत्र, ईएसआई, ईपीएफ़ जैसी कोई सुविधाएँ नहीं मिलतीं।

हरियाणा में यूनियन बनाने की सज़ा – मुक़द्दमा और जेल!

31 मई को सुबह से ही मज़दूर अपने परिवारजनों के साथ अपनी अनसुनी माँगों को उठाने के लिए फ़ैक्टरी के बाहर धरने पर बैठे थे। मैनेजमेण्ट की शिकायत पर हरियाणा पुलिस वहाँ एकत्रित हो गयी, प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, उन्हें हिरासत में ले लिया और उन पर साँपला थाने में मुक़द्दमा दर्ज कर दिया। एफ़आईआर के अनुसार मज़दूरों पर आरोप है कि वे ग़ैर-क़ानूनी रूप से ख़तरनाक हथियार (यानी झण्डे!) लेकर एकत्रित हुए, रास्ता रोका, कम्पनी के गेट को जाम कर दिया, कम्पनी के स्टाफ़ को धमकी दी और आम चोट पहुँचाई।

आइसिन ऑटोमोटिव, रोहतक के मज़दूरों का जुझारू संघर्ष जारी है ज़ोर है कितना दमन में तेरे, देख लिया है, देखेंगे!

फ़ैक्टरी के स्तर पर व्यापक एकजुटता के बावजूद भी मालिक वर्ग को आसानी से नहीं झुकाया जा सकता। इसका एक प्रमुख कारण तो यही है कि पूँजीपति वर्ग ने आज उत्पादन को एक फ़ैक्टरी में करने कि बजाय बिखरा दिया है। एक ही प्रकार का माल विभिन्न यानी एक से ज़्यादा वेण्डर कम्पनियाँ उपलब्ध करा देती हैं या फ़िर एक ही मालिक की कई-कई वेण्डर कम्पनियाँ अलग-अलग जगह पर चलती हैं। जैसेकि आइसिन कम्पनी ही वैश्विक स्तर पर काम करती है तथा पूरी दुनिया में 190 से भी ज़्यादा कम्पनियाँ चलाती है। इसी कारण से मज़दूर अपने संघर्ष के दौरान मालिक के मुनाफ़े के चक्के को जाम नहीं कर पाते। दूसरा मालिक वर्ग आपस में अपने “बुरे वक़्त” में एक-दूसरे का साथ भी दे देते हैं जैसे आइसिन के मालिक और कम्पनी की मैनेजमेण्ट का साथ मारुती और मिण्डा कम्पनी की मैनेजमेण्ट समेत अन्यों ने मदद करके दिया।

आइसिन ऑटोमोटिव के मज़दूर कम्पनी प्रबन्धन के शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष की राह पर

कम्पनी में लम्बे समय से काम कर रहे और संघर्ष की अगुवाई कर रहे जसबीर हुड्डा, अनिल शर्मा, उमेश, सोनू प्रजापति तथा अन्य मज़दूरों ने बताया कि कम्पनी में मज़दूरों के साथ लगातार बुरा व्यवहार किया जाता है। भाड़े के गुण्डों जिन्हें सभ्य भाषा में बाउंसर कह दिया जाता है और प्रबन्धन के लोगों द्वारा गाली-गलौज करना और गधे तक जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना आम बात है। काम कर रही स्त्री मज़दूरों के साथ भी ज़्यादतियाँ और छेड़छाड़ तक के मामले सामने आये, किन्तु संज्ञान में लाये जाने पर प्रबन्धन के उच्च अधिकारियों द्वारा इन्हें आम घटना बताकर भूल जाने की बात कही गयी। मज़दूरों ने अपनी मेहनत के बूते कम्पनी को आगे तो बढ़ाया किन्तु इसका ख़ामियाज़ा मज़दूरों को ही भुगतना पड़ा। शुरुआत में जहाँ एक ‘प्रोडक्शन लाइन’ पर 25 मज़दूर काम करते थे, वहीं अब उनकी संख्या घटकर 18 रह गयी। पहले जहाँ एक घण्टे में 120 पीस तैयार होते थे, वहीं अब उनकी संख्या 300 तक पहुँच गयी, किन्तु मज़दूरों के वेतन में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। कई मज़दूर साथियों के वेतन में तो सालाना 1 रुपये तक की भी बढ़ोत्तरी हुई है। ‘बोनस’ के नाम पर मज़दूरों को एक माह के वेतन के बराबर राशि देने की बजाय छाता और चद्दरें थमा दी जाती हैं। कम्पनी के कुछ बड़े अधिकारी तो सीधे जापानी हैं तथा अन्य यहीं के देसी लोग हैं, किन्तु मज़दूरों को लूटने में कोई किसी से पीछे नहीं है।