आनन्द तेलतुम्बड़े पर फ़र्ज़ी आरोप, तेज़ी से सिकुड़ते बुर्जुआ जनवाद की एक और बानगी
आनन्द तेलतुम्बड़े एक अम्बेडकरवादी चिन्तक और लेखक हैं। उनके कई लेख और किताबें प्रसिद्ध हुई हैं, जिनमें वो ख़ासकर जातिवाद के ख़िलाफ़ मुखरता से अपना पक्ष लिखते रहे हैं। उन्होंने “जाति का प्रजातन्त्र”, “महार : द मेकिंग ऑफ़ द फ़र्स्ट दलित रिवोल्ट” जैसी आज की बेहद प्रासंगिक किताबें लिखी हैं। उनके विचारों से हमारी तमाम असहमतियाँ हो सकती हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि वर्तमान फ़ासिस्ट निज़ाम के ख़िलाफ़ वे शुरू से ही लिखते और बोलते रहे हैं। ऐसे में, स्वाभाविक ही वे सरकार की आँखों में चुभते रहे हैं, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सरकार उन्हें निशाना बना रही है।























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