वे अपना विकल्प चुन रहे हैं! हमें अपना विकल्प चुनना होगा!
पूँजीपति वर्ग को हमेशा ही अपने हितों की सेवा करने के लिए कई बुर्जुआ पार्टियों की आवश्यकता होती है। कारण यह कि जनविरोधी और पूँजीपरस्त नीतियों को लागू करना हो तो एक पार्टी काफ़ी नहीं होती, क्योंकि पूँजीवादी संसदीय जनतन्त्र में कुछ वर्षों में ही जनविरोधी नीतियों पर अमल के कारण उसकी स्वीकार्यता और विश्वसनीयता कम होने लग जाती है। ऐसे में, हर पाँच या दस वर्ष बाद सरकार में एक पार्टी की जगह दूसरी और दूसरी की जगह कभी-कभी तीसरी पूँजीवादी पार्टी को सरकार में बिठाना पूँजीपति वर्ग के लिए ज़रूरी होता है। लेकिन इन सभी पार्टियों का मक़सद पूँजीवादी व्यवस्था में एक ही होता है: पूँजीपति वर्ग की सेवा करना! अगर कांग्रेस और भाजपा और साथ ही अन्य पूँजीवादी चुनावी पार्टियों की आर्थिक नीतियों पर एक निगाह डालें तो यह बात साफ़ हो जाती है।























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