Category Archives: नेताशाही व नौकरशाही

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार और बुलडोज़र का आतंक!

बंगाल में नये नवेले पहुँचे “बुलडोज़र राज” ने छोटे दुकानदारों, रेहड़ी पटरी वालों, फेरीवालों की आजीविका पर गम्भीर असर डाला है। ध्वस्तीकरण अभियान चलाने से पहले, तोड़फोड़ की कार्रवाई करने से पहले कहीं भी उन्हें पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। कई छोटे व्यापारियों का कहना था कि जमींदोज़ की गईं कई दुकानें दशकों से मौजूद थीं और उन्होंने प्रशासन से उसके पुनर्वास या वैकल्पिक वेंडिंग (दुकान लगाने) की व्यवस्था की माँग की थी। लेकिन बजाय उनकी माँग पर ग़ौर फ़रमाने के सरकार ने उन्हें बुलडोज़ कर दिया। ग़ौरतलब है कि,”बुलडोज़र राज” में तमाम वैधानिक, क़ानूनी प्रक्रियाओं को धता बताते हुए, बुलडोज़र चलाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने नवम्बर 2024 में ध्वस्तीकरण, बुलडोज़र कार्रवाई के सम्‍बन्‍ध में दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिसमें अनिवार्य 15 दिन की नोटिस अवधि भी शामिल है, इन तमाम कार्रवाइयों में उन दिशानिर्देशों की अवेहलना की जा रही है। विडम्बना है कि बंगाल चुनाव के दौरान झालमुड़ी खाने की नौटंकी करने वाले महामानव की सरकार बनने के बाद झालमुड़ी बेचने वालों को ही दर-बदर किया जा रहा है।

करोड़ों लोगों के वोट देने के बुनियादी राजनीतिक अधिकार छीनने वाली एसआईआर (SIR) की क़वायद पर सर्वोच्च न्यायालय की मुहर!

एसआईआर वास्तव में भाजपा द्वारा अपने गिरते हुए जनाधार की सूरत में भी लम्बे समय तक सत्ता में बने रहने के तमाम हथकण्डों में से एक है। अगर हम एसआईआर को भाजपा की अन्य आगामी हथकण्डों—परिसीमन, एक देश एक वोट और क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ना— के साथ देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले दिनों में येन-केन-प्रकारेण सत्ता में बने रहने की उसकी रणनीति क्या है। पहले जनता सरकार को चुनती थी अब सरकार जनता को चुनेगी।

तृणमूल काँग्रेस (टीएमसी) में मची भगदड़ के मायने

फ़ासीवादी किसी भी प्रकार की भलमनसाहत या “नैतिकता” की मध्यवर्गीय याचनाओं और अपीलों से कभी प्रभावित नहीं होते। आर.एस.एस. के गुरू गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी अवर नेशनहुड डिफ़ाइण्ड’ में जर्मन नात्सियों व हिटलर की प्रशंसा की थी। भारतीय फ़ासीवादियों के विचारधारात्मक पितामह हिटलर ने भी जर्मनी में विपक्षी पार्टियों को जैसे-तैसे करके ठिकाने लगाया था। एक योग्य वंशज की भाँति भारतीय फ़ासीवादी भी अपने पुरखों के नक़्शे-क़दम पर चल रहे हैं। बल्कि कुछ मामलों में वे योजनाबद्धता, अपने इतिहास से सीखने, रणकौशल बनाने, धैर्य से लम्बी रणनीति पर सुचिन्तित अमल करने के मामले में हिटलर और मुसोलिनी से आगे जा चुके हैं।

पाँच राज्‍यों के विधान सभा चुनावों के नतीजों से फ़ासीवाद का विस्‍तार स्‍पष्‍ट: मज़दूर वर्ग के लिए इसके मायने क्‍या हैं?

पाँच राज्‍यों के इन चुनावी नतीजों से कुल मिलाकर जो तस्‍वीर उभरती है वह निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए चिन्‍ता का सबब है। फ़ासीवादी दानव की बढ़ती ताक़त और देश के नए हिस्‍सों में उसका पैर पसारना निश्चित रूप से मज़दूर वर्ग के लिए एक बुरी ख़बर है क्‍योंकि इसमें कोई दो राय नहीं कि फ़ासीवादी भाजपा मज़दूरों की दुश्‍मन नंबर वन है। परन्‍तु ऐसे में बदहवास होकर किसी ग़ैर-फ़ासीवादी पार्टी का पिछलग्‍गू बनने से मज़दूरों की समस्‍याओं का समाधान नहीं होने वाला और न ही इससे फ़ासीवादियों को निर्णायक शिकस्‍त मिलने वाली है। आज ज़रूरत योजनाबद्ध ढंग से मज़दूर वर्ग के बीच क्रान्तिकारी विचारों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार करने की है और फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष को पूँजीवाद-विरोधी संघर्ष के अभ‍िन्‍न अंग के रूप में आगे बढ़ाने की है।

बंगाल में चुनाव आयोग की मिलीभगत से एसआईआर के ज़रिये चुनाव को ‘हाईजैक’ करने में जुटी फ़ासिस्ट भाजपा!

बंगाल के साथ-साथ अन्य 12 राज्यों में घोषित या अघोषित तौर पर एसआईआर की प्रक्रिया जारी है। इन तमाम राज्यों में ख़ासकर ग़रीबों, मुसलमानों, दलितों, स्त्रियों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर का कोई एक स्वरूप नहीं है। हर राज्य में भाजपा व मोदी सरकार अलग-अलग तरीक़ों से चुनाव आयोग के साथ मिलकर इसे अंजाम दे रही है। सवाल यह भी उठता है कि बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ से ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर अलग-अलग राज्यों में काम करने के लिए जाते हैं और प्राकृतिक आपदाओं समेत अन्य कारकों की वजह से उनके प्रमाण पत्र या पहचान कार्ड उनके पास नहीं है, क्या उन सबको डिटेंशन कैंप में भेज दिया जायेगा? फ़ासीवादी भाजपा की मानें तो अब “अमृतकाल” में  इस देश में ऐसा ही होगा!

महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव: अहमदनगर नगर निगम चुनाव में भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) 17 प्रतिशत आबादी की पसन्द बनकर तीसरे स्थान पर रही

चुनाव आते-जाते रहेंगे, किन्तु मज़दूर एवं मेहनतकश वर्ग का वास्तविक संघर्ष सड़क पर है – सम्मानजनक जीवन हेतु, रोजगार-शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे मूलभूत अधिकारों हेतु तथा पूँजीवाद और विशेषतः फ़ासीवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी सामाजिक आंदोलन के निर्माण हेतु। आने वाले दिनों में ज़्यादातर नगर निगमों में पुनः फ़ासीवादी भाजपा नेतृत्व वाली महायुती और कुछ एक नगर निगमों में दूसरी चुनावबाज़ पार्टीओं का शासन स्थापित होने वाला है। नगर निगमों में बिल्डरों, ठेकेदारों, दलालों, व्यापारियों और बड़े–छोटे पूँजीपतियों के हाथ में सत्ता पहले की तरह बनी रहेगी। लूट, निजीकरण, ठेकेदारी व्यवस्था, नगरीय जनसुविधाओं की कमी, बस्तियों की बदहाली, नशाख़ोरी, अपराध तथा जाति-धर्म-भाषा आधारित संघर्ष यथावत् बने रहेंगे। पूंजीपति वर्ग की लूट पहले की तरह जारी रहेगी – केवल उसकी लूट के आपसी बँटवारे में छोटा-मोटा परिवर्तन होगा।

बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा गठबन्धन की अभूतपूर्व विजय और हमारे कार्यभार

इसमें कोई शक़ नहीं है कि जनता में उसके मताधिकार के बुनियादी राजनीतिक अधिकार को प्रभावत: रद्द किये जाने की मोदी-शाह शासन की साज़िशों को लेकर असन्तोष है। लेकिन साथ ही कोई राजनीतिक नेतृत्व, दिशा और कार्यक्रम न होने के कारण उनमें एक प्रकार की हताशा और तटस्थता का भाव भी है। ज़ाहिर है, विकल्पों के अभाव में जब जनता के अधिकार लगातार छीने जाते हैं तो शान्ति की प्रतीतिगत स्थिति हमेशा बनी नहीं रहती है। जनता का यह गुस्सा और असन्तोष कभी न कभी फूटकर सड़कों पर बहता है। लेकिन बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व और संगठन के ऐसे विस्फोट कोई स्थायी समाधान नहीं पेश कर पाते। वे अक्सर ज़्यादा से ज़्यादा एक जनविद्रोह की शक़्ल ले पाते हैं, जैसा कि बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में हुआ। लेकिन शासक वर्ग ऐसे विद्रोहों से उसके शासन और राज्यसत्ता में पैदा होने वाले उथल-पुथल और विक्षोभ को जल्द ही क़ाबू में कर लेता है। तात्कालिक तौर पर, कोई सुधारवादी दिखने वाला चेहरा जनता के सामने आगे कर दिया जाता है ताकि जनता के गुस्से के झटके को सोखा जा सके। श्रीलंका में जेवीपी की सरकार, बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अन्तरिम सरकार और नेपाल में सुशीला कार्की की अन्तरिम सरकार लाकर यही किया गया था। बुनियादी राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया। जनता भी अपने गुस्से को ऐसी विद्रोही अभिव्यक्ति देने के बाद भ्रम का शिकार होकर घरों को वापस लौट जाती है और पूँजीपति वर्ग का शासन बरक़रार रहता है। इसलिए महज़ पूँजीवाद की कुछ अभिव्यक्तियों व लक्षणों पर स्वत:स्फूर्त विरोध और विद्रोह करने से चीज़ें नहीं बदलती हैं। उसके लिए एक क्रान्तिकारी राजनीति, संगठन और विचारधारा की आवश्यकता होती है। दुनियाभर में आज इन क्रान्तिकारी तत्वों के अभाव में ही विभिन्न स्वत:स्फूर्त पूँजीवाद-विरोधी विद्रोह और विरोध-आन्दोलन ज़्यादा से ज़्यादा कुछ तात्कालिक राहत व सुधार प्राप्त करके समाप्त हो जा रहे हैं। वास्तव में, 2007 में वैश्विक महामन्दी की शुरुआत के बाद से ही दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हम बार-बार यह होता देख रहे हैं।

वोटचोरी : फ़ासीवाद की प्रयोगशाला से निकला सत्ता हथियाने का नया हथकण्डा!

आज की तारीख़ में जनता को उनके वास्तविक मुद्दों पर संगठित कर सड़कों पर उतरने का माद्दा किसी भी चुनावबाज़ पार्टी  में नहीं है। ये तमाम पार्टियाँ असल में पूँजीपति वर्ग के ही विभिन्न धड़ों की नुमाइन्दगी करती हैं। इसलिए इनसे ज़्यादा उम्मीद करना ही बेमानी है। आज मतदान के राजनीतिक जनवादी अधिकार पर हो रहे फ़ासीवादी हमले के विरुद्ध भी क्रान्तिकारी शक्तियों को आम जनता को गोलबन्द और संगठित करना होगा, राजनीतिक जनवाद के अधिकार की हिफ़ाज़त के इस मुद्दे को भी अपने हाथों में लेना होगा और इसके लिए एक जनान्दोलन खड़ा करना होगा। जनता के मताधिकार की रक्षा के लिए खड़ा हुआ आन्दोलन देश में फ़ासीवाद-विरोधी संघर्ष की अहम कड़ी होगी।

एसआईआर के फ़र्जीवाड़े से लाखों प्रवासी मज़दूरों, मेहनतकशों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों के मताधिकार के हनन के बीच बिहार विधानसभा चुनाव – जनता के सामने क्या है विकल्प?

दूसरी ख़ास बात जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए वह यह है कि एसआईआर के ज़रिये मोदी-शाह जोड़ी ने वास्तव में वह काम करने का प्रयास किया है जो जनता के जुझारू आन्दोलनों के कारण वे देश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के ज़रिये नहीं कर पायी थी। वास्तव में, चुनाव आयोग को नागरिकता की वैधता जाँचने, उसे क़ायम रखने या रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। 2003 एसआईआर के दिशा-निर्देश स्पष्ट शब्दों में यह बात कहते हैं कि नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार सिर्फ़ गृह मन्त्रालय को है। शाह का गृह मन्त्रालय देशव्यापी जनविरोध के कारण देश के पैमाने पर एनआरसी नहीं करवा सका, तो अब यह काम चोर-दरवाज़े से एसआईआर के ज़रिये करवाया जा रहा है। यही कारण है कि जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पक्षों ने 2003 के दिशा-निर्देशों को ज़ाहिर करने की बात की तो केचुआ ने कहा कि उसको वह दिशा-निर्देशों वाली फ़ाइल नहीं मिल रही है! यह भी मोदी-राज की एक ख़ासियत है! वही फ़ाइलें मिलती हैं जिसका फ़ायदा मोदी-शाह उठा सकते हैं! बाक़ी या तो ग़ायब हो जाती हैं, या फिर जल जाती हैं!

मोदी सरकार व केचुआ के वोट-घोटाले के विरुद्ध देशव्यापी जनान्दोलन खड़ा करो! मतदान और निष्पक्ष व स्वतन्त्र चुनावों का अधिकार जनता का एक बुनियादी राजनीतिक जनवादी अधिकार है!

मौजूदा फ़ासीवादी निज़ाम में हमसे पहला अधिकार, यानी ‘चुनने का अधिकार’ भी प्रभावत: और व्यवहारत: छीन लिया गया है। ईवीएम घोटाले और वोट-चोरी घोटाले का यही अर्थ है। वोट किसी को भी दें, पहले से ही विजेता तय है, यानी भाजपा। हमने पहले भी लिखा है कि इक्कीसवीं सदी के फ़ासीवाद की एक ख़ासियत यह है कि यह खुले तानाशाही क़ानून लाकर चुनावों, संसदों, विधानसभाओं आदि को भंग नहीं करता है। उल्टे यह पूँजीवादी लोकतन्त्र के खोल को, यानी उसके रूप को बनाये रखता है। लेकिन साथ ही यह पूँजीवादी राज्यसत्ता के समूचे उपकरण पर एक लम्बी प्रक्रिया में अन्दर से कब्ज़ा करता है, यानी सेना, पुलिस, नौकरशाही, समस्त संवैधानिक संस्थाएँ, न्यायपालिका, आदि सभी में फ़ासीवादी संगठन एक लम्बी प्रक्रिया में घुसपैठ कर अपनी जगहें बना लेता है। उसी प्रकार, फ़ासीवादी संगठन समाज के भीतर भी अपनी शाखाओं, स्कूलों, मीडिया, सुधार-कार्य की संस्थाओं जैसे अस्पताल आदि के ज़रिये अपनी अवस्थितियाँ बाँध लेता है, यानी अपनी खन्दकें खोद लेता है।