पर्यावरणीय विनाश के चलते सिमटता वसन्त

सनी

भारत में और दुनिया भर में वसन्त का मौसम धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। इस मौसम में ही फूल खिलते हैं और शरद की ठण्ड में थमा-जमा सा प्रतीत होता जीवन अपने चटख रंगों में फूटकर निखर उठता है। लेकिन पर्यावरण में परिवर्तन के चलते यह ऋतु ही सिमटती जा रही है। न केवल वसन्त बल्कि सभी मौसमों से अधिक ग्रीष्म ऋतु का दौर लम्बा खिंच रहा है। पिछले साल दिल्ली में 50 डिग्री तापमान जाना अभी भी आम जनता की स्मृति से मिटा नहीं है। न सिर्फ़ यह बल्कि पिछले कुछ सालों में ओलावृष्टि, लू, तूफ़ानों और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की आवर्तिता में बढ़ोत्तरी हुई है। तेज़, तीखे परिवर्तन और ग्रीष्म ऋतु का विस्तार धरती के तापमान के बढ़ने के कारण हो रहा है। हिमखण्डों के सिमटने से लेकर कई जीव प्रजातियों का विलुप्त होना भी धरती के तापमान बढ़ने के कारण हो रहा है। पर्यावरण में हो रहा यह परिवर्तन एक ऐसी मंज़िल पर पहुँच गया है जहाँ धरती को अपरिवर्तनीय क्षति होने की सम्भावना पैदा हो चुकी है।

नासा के प्रसिद्ध वैज्ञानिक हान्सेन ने इस साल फ़रवरी में घोषणा की कि यूनाइटेड नेशन्स के पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान को औद्योगिक क्रान्ति पूर्व से दो सेल्सियस वृद्धि की सीमा तक थामने का क़रार ‘मर’ चुका है और हम अभी ही इस तापमान वृद्धि से आगे बढ़ चुके हैं। हान्सेन अपने शोध की रिपोर्ट के माध्यम से बताते हैं कि आम जनता को यह पता होना चाहिए कि ‘टूसी’ (2C) के नाम से जाना जाने वाले इस क़रार का अन्त हो चुका है और इसके नतीजे भयंकर होने वाले हैं। धरती का तापमान 2o सेल्सियस तक बढ़ने के बाद कुछ ऐसी प्रक्रियाएँ शुरू होने वाली हैं जो अपरिवर्तनीय हैं, मसलन धरती बर्फ़ के आवरण से मुक्त हो जाएगी, सागर धरती के बड़े हिस्से को निगल लेंगे, महत्वपूर्ण महासागरीय धाराएँ मृत हो जायेंगी और आकस्मिक पर्यावरणीय परिवर्तन सामान्य हो चलेंगे। हान्सेन के अनुसार हम 2o सेल्सियस की इस तापमान वृद्धि की ‘चट्टान’ को पार कर गहरी खाई में गिरने को अभिशप्त हैं और अब धरती पहली जैसी नहीं रहेगी।

हान्सेन यह भी बताते हैं कि आज इस पर्यावरण संकट से बचने का रास्ता किसी आमूलगामी परिवर्तन से ही सम्भव है। हान्सेन इस तबाही का ज़िम्मेदार इस दुनिया के पूँजीपतियों को मानते हैं। लेकिन वह यहाँ आकर रुक जाते हैं। वह यह नहीं कहते हैं कि यह परिवर्तन सामाजिक क्रान्ति के बिना नहीं हो सकता है। वह यह तो कहते हैं कि इस दुनिया की बर्बादी का कारण पूँजीवाद है लेकिन इसे बदलने का रास्ता देने में यह वैज्ञानिक अक्षम है। पर्यावरण को बचाने का रास्ता कॉलेज कैम्पस पाठ्यक्रम में मौजूद विषय ‘इकोलॉजी’ से नहीं दिया जा सकता है। इसका रास्ता राजनीतिक तौर पर ही दिया जा सकता है। रोके दाल्तोन ने सही ही कहा था कि एक विषय के तौर पर “इकोलॉजी” महज़ “गूँज है, पूँजीवाद द्वारा दुनिया की तबाही से मचे शोर की”। यह विषय ही पर्यावरण में परिवर्तन और वर्गविहीन मानव समाज के सम्बधों की पड़ताल करता है। मौजूदा पर्यावरणीय आपदा न तो प्राकृतिक आपदा है और न ही इसे “मानवनिर्मित” आपदा कहा जाना चाहिए।

चाहे गर्मी हो, सर्दी हो या बिन मौसम आयी बरसात हो, इसका बोझ ग़रीब जनता को ही उठाना पड़ता है। लू में या शीत लहर में जो मरते हैं, बाढ़ में जिनके घर बहते हैं, सूखे में जो प्यासे मरते हैं वे ग़रीब ही हैं। मौसम में आने वाले अनियमित परिवर्तनों की मार से अमीर और उच्च मध्य वर्ग अपने घरों में लगे एसी, हीटर, वाटर प्रूफ़ छतों और अन्य सुविधाओं के दम पर आम तौर पर तात्कालिक तौर पर बच निकलते हैं। पर्यावरण की मार का असर सबसे ज़्यादा ग़रीब आबादी पर होता है और अमीरों की यह आबादी सामान्यतः इससे तात्कालिक तौर पर अप्रभावित ही रहती है तो यह सवाल पूछना भी लाज़मी है कि इसके पीछे ज़िम्मेदार कौन है? इसके दोषी का तब पता चल जाता है जब हम यह देखते हैं कि धरती के तापमान के बढ़ने का कारण क्या है और यह पर्यावरण आपदा में क्यों  बदल जाता है? यह विशुद्ध तौर पर मुनाफ़े की खातिर अँधाधुन्ध जीवाश्म-आधारित ईंधन, यानी पेट्रोल व डीज़ल, आदि की खपत के कारण, पूँजीवादी खेती, खान-खदान और उद्योग के कारण जंगलों के सफ़ाये के कारण हो रहा है। धरती पर समुद्र, पर्वत और जंगलों के जीवन-प्रवाह को मौजूदा मुनाफ़ा-आधारित व्यवस्था भंग कर रही है।

धरती पर सूरज की रौशनी का एक हिस्सा वायुमण्डल द्वारा ही वापस भेज दिया जाता है लेकिन रौशनी का एक हिस्सा धरती की सतह और सागर सोख लेते हैं जिसे वह ऊष्मा के रूप में वापस रेडिएट करते हैं। यही धरती के तापमान को एक निश्चित सीमा तक ले जाता है जिस सीमा के भीतर एक समय धरती की सतह पर जीवन की प्रक्रिया शुरू हो सकी और आज भी जारी है। लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के बाद से धरती के गर्भ से जीवाश्म ईंधन को निकालकर जलाने की वजह से धरती का तापमान अपनी नैसर्गिक तापमान वृद्धि से अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है। धरती पर जीवन सूरज की रौशनी को ही सोखकर संचालित होता है और एक तय सीमा तक तापमान सीमित रहता है। जीवाश्मों के जलने से जमी हुई मृत “सूरज की रौशनी” जीवित सूरज की रौशनी के साथ मिलकर तापमान को अधिक तेज़ी से बढ़ा रही है। इसके चलते ही धरती पर ऐसे बदलाव हो रहे हैं जो जीवन के कई रूपों के लिए अन्तकारी सिद्ध हो रहे हैं। यह ऐसा है मानो धरती को बुखार चढ़ गया हो। बुखार एक सीमा से आगे जाए तो मनुष्य के लिए जिस प्रकार जानलेवा होता है वैसे ही धरती पर तापमान वृद्धि भी धरती पर जीवन के लिए जानलेवा है। यह भयंकर होती परिस्थिति सबसे अधिक नाशकारी इस धरती की आम ग़रीब मेहनतकश जनता के लिए है।

जानलेवा होते ये पर्यावरण परिवर्तन पूँजी द्वारा प्रकृति की अन्धी लूट के कारण हैं। पर्यावरण परिवर्तन की तमाम चिन्ता पूँजीवादी देशों के हुक्मरानों के एजेण्‍डे में ही नहीं हैं। उनकी चिन्ता मुनाफ़े की गिरती दर को रोकने के ख्यालों और प्रयासों में ही डूबी है जो उन्हें श्रम और प्रकृति को और अधिक लूटने की ओर ही धकेलती है। भारत सरकार द्वारा जंगलों से लेकर पर्वतों, नदियों को नष्ट करने की योजनाओं पर मुहर लगाने से लेकर साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा ग्रीनलैण्‍ड, आर्कटिक और अण्टार्क्टिक में जीवाश्म ईंधन के भण्डार की लूट के लिए रस्साकशी हो या ब्राज़ील के अमेज़न जंगलों की तबाही, यह स्पष्ट है कि पर्यावरण को बचाना इनके एजेण्डे में है ही नहीं। स्पष्ट ही है कि पर्यावरण को बचाने का मुद्दा भी आम मेहनतकश जनता के जीने के हक़ से जुड़ा मुद्दा है। पर्यावरण वैज्ञानिक हान्सेन की ‘2 सी इज़ डेड’ की यह चेतावनी पूँजीवादी हुक्मरानों के बहरे कानों पर पड़ रही है। यह मसला आज मज़दूरवर्गीय राजनीति का अहम मुद्दा है। यह दुनिया के मज़दूरों और मेहनतकशों के जीवन के अधिकार का ही मुद्दा है और इसके लिए संघर्ष भी मज़दूरवर्गीय राजनीति से ही लड़कर दिया जा सकता है न कि हुक्मरानों के आगे की गयी गुहारों से!

 

  • पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 1880 के बाद से लगातार बढ़ रहा है। जबसे तापमान मापा जा रहा है तबसे 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है, और पिछले 10 साल अब तक के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं।
  • पिछले वर्ष आयी ऑक्सफ़ैम की रिपोर्ट ने यह दिखलाया है कि दुनिया के 1 प्रतिशत सबसे अमीर लोग 16 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए और 10 प्रतिशत सबसे अमीर लोग 50 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं।
  • दुनिया के सबसे ग़रीब 66 प्रतिशत लोग, जिसमें हम और आप भी शामिल हैं, जितना कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करते हैं, उससे ज़्यादा प्रदूषण दुनिया के 1 प्रतिशत लोग करते हैं।
  • 2022 में 125 अरबपतियों ने अपने उद्योगों में औसतन 30 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन किया जबकि दुनिया की सबसे ग़रीब 90 प्रतिशत आबादी इस साल औसतन महज़ 3 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार थी।
  • ग्रीनपीस फ़ाउण्डेशन के अनुसार पिछले तीन सालों में यूरोप के अमीरों ने अपने निजी हवाई जहाज़ों से 53 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन किया है।

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2025


 

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